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सहरिया जनजाति का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन -एक समग्र अध्ययन

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प्रस्तावना -   सहरिया जनजाति राजस्थान की जनजातियों में सबसे कम विकसित, पिछड़ी एवं एकमात्र आदिम जनजाति है। सहरिया शब्द की उत्पत्ति ' सहर' से हुई है जिसका अर्थ जंगल होता है।  सहरिया जनजाति को भारत सरकार ने आदिम जनजाति समूह पी.वी. टी.जी. में शामिल किया है। यह राजस्थान के बारां जिले की किशनगंज एवं शाहबाद तहसीलों में निवास करती है। क्षेत्र की कुल जनसंख्या 2.73 लाख है जिसमे से सहरिया क्षेत्र की जनजाति की जनसंख्या 1.02 लाख है जो क्षेत्र की कुल जनसंख्या का 37.44 प्रतिशत है। सहरिया जनजाति अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परम्पराओं, जीवन शैली तथा प्रकृति आधारित विश्वासों के लिए जानी जाती है। सहरिया जनजाति का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन केवल परम्पराओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उनके संघर्ष, सामुहिकता, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक निरन्तरता का प्रतीक है।       प्रस्तुत लेख का उद्देश्य सहरिया जनजाति के सामाजिक संगठन, पारिवारिक संरचना, विवाह व्यवस्था, धार्मिक विश्वास, लोकसंस्कृति, पर्व-त्योहार, कला, शिक्षा एवं समकालीन परिवर्तन का विस्तृत और तथ्यात्मक अध्ययन प्रस्तु...

डामोर जनजाति: इतिहास, संस्कृति एवं कला का एक समग्र अध्ययन

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  सारांश  -  भारत की जनजातीय संस्कृति उसकी बहुलतावादी सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण आधार है। डामोर जनजाति, जो भील जनजातीय समूह की एक प्रमुख उप जनजाति है, पश्चिमी भारत विशेषकर राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करती है। यह शोध-पत्र डामोर जनजाति के ऐतिहासिक विकास, सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन, कला परंपराओं, धार्मिक विश्वासों तथा समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि डामोर जनजाति की संस्कृति प्रकृति-आधारित जीवन दर्शन, सामुदायिक सहभागिता और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर आधारित है। वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से इस जनजाति की सांस्कृतिक पहचान पर संकट उत्पन्न हो रहा है। अतः इस शोध का उद्देश्य डामोर जनजाति की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं प्रलेखन की आवश्यकता को रेखांकित करना है। मुख्य शब्द : डामोर जनजाति, भील, जनजातीय संस्कृति, लोक कला, स्वदेशी ज्ञान प्रणाली, सांस्कृतिक संरक्षण भूमिका -  भारत को जनजातियों का देश कहा जाता है, जहाँ विविध भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक परिवेश म...

गरासिया जनजाति में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां: संरक्षण, प्रलेखन, चुनौतियां एवं समाधान

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  सारंश (Abstract)      भारत की जनजातीय संस्कृतियाँ स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। गरासिया जनजाति, जो मुख्यतः राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करती है, प्रकृति-आधारित जीवनशैली, पारंपरिक कृषि, औषधीय ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से स्वदेशी ज्ञान का संरक्षण करती आई है। यह शोध पत्र गरासिया जनजाति की स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है तथा इनके संरक्षण, प्रलेखन से जुड़ी चुनौतियों एवं समाधान पर प्रकाश डालता है। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि गरासिया जनजाति का पारंपरिक ज्ञान वर्तमान वैश्विक समस्याओं-जैसे जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता क्षरण एवं स्वास्थ्य संकट के सर में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कीवर्ड - गरासिया जनजाति, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियांः संरक्षण, प्रखेलन चुनौतियां, समाधान भूमिका- भारत की जनजातीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। इन जनजातियों द्वारा विकसित स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां (Indigenous Knowledge Systems - IKS) प...

राजस्थान की प्रमुख आदिवासी भील और गरासिया जनजातियों के वाद्य यंत्र और उनका सांस्कृतिक महत्व

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     राजस्थान की आदिवासी जनजातियां भारत की आदिम जनजातियां हैऔर देश की सभ्यता एवं संस्कृति  को बनाए रखने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जनजातियों के लोक गीतों एवं नृत्यों में वाद्य यंत्रों का स्थान सर्वोपरि है। राजस्थान की आदिवासी जनजातियों (भील, मीणा, डामोर गरासिया आदि) के प्रमुख वाद्य यंत्रों में मांदल (मिट्टी का ढोल), ढोल, कुंडी, थाली, शहनाई, पवारी (सींग व लकड़ी का वाद्य), और डोवला (बांसुरीनुमा) शामिल हैं, जो उनके पारंपरिक गीतों, नृत्यों (जैसे गवरी) और धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग हैं, हालांकि आधुनिकता के प्रभाव से इनका प्रचलन कम हो रहा है।      राजस्थान के लोक संगीत में यहाँ के लोकवाद्यों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके प्रयोग से गीतों व नृत्यों में माधुर्य वृद्धि होतो है साथ ही वातावरण एवं भावाभिव्यक्ति प्रभावशाली बनती है। यहाँ के परिवेश, स्थिति व भावों के अनुरूप लोक वाद्यों का प्रचुर विकास हुआ है।  भील जनजाति के प्रमुख लोक वाद्य यंत्र -      भारत की आदिवासी संस्कृति में संगीत और वाद्य यंत्र केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि...

रेडियो के माध्यम से मन की बात का जनजातीय विद्यार्थियों पर प्रभाव

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     आज की बदलती हुई विश्व परिकल्पना में प्रसारण व संचार माध्यमों की अपनी विशिष्ट पहचान है। बीसवीं सदी को संचार क्रांति या मीडिया युग की संज्ञा दी जा सकती है। प्रेस, रेडियो और टेलीविजन के विस्तार में वैचारिक क्रांति, सामाजिक मान्यताओं, सांस्कृतिक मूल्यों एवं राजनीतिक चेतना के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन का सूत्रपात किया है। समग्र विश्व आज सिमट कर एक गांव बन गया है। संचार क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान रेडियो का रहा है। भारत में पहला रेडियो प्रसारण अगस्त 1921 ई का वह विशेष संगीत का कार्यक्रम था जो टाइम्स ऑफ इंडिया के डाक-तार विभाग के सहयोग से मुंबई कार्यालय से सर जॉन लॉयड के अनुरोध पर प्रसारण किया गया था।         रेडियो की विकास यात्रा में सर्वप्रथम स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सेवा दिनांक 1 अप्रैल 1930 को प्रारंभ की गई, इसके पश्चात् 1936 में ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हुई। ऑल इंडिया रेडियो का नामकरण 1997 में आकाशवाणी कर दिया गया। दिनांक 23 नवंबर 1997 को भारतीय प्रसारण निगम की स्थापना की गई। भारतीय प्रसारण निगम ने भारत के जनसाधारण के लिए आकाशवाणी द्वारा प्रस...

दक्षिणी राजस्थान की जनजातीय पाक कला : सांस्कृतिक विरासत, औषधीय महत्व एवं आधुनिक चुनौतियां

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        दक्षिणी राजस्थान की जनजातियों की अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परम्परा रही है। अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिये इन जनजातियों ने न केवल बाह्य ताकतों का सामना किया है बल्कि वनों तथा पहाडों की सुरक्षा में अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को भी जीवित रखा। राजस्थान में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या की 13.5 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति निवास करती है। दक्षिणी राजस्थान में भील, मीणा, गरासिया और डामोर जनजातियांनिवास करती है।          दक्षिणी राजस्थान विशेषकर उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा, प्रतापगढ़, सलुम्बर और सिरोही जिलों में भील, मीणा गरासिया और डामोर जनजातियां निवास करती है। इन जनजातीय समुदायों की पाक कला में स्थानीय उपज, जंगली सामग्री, मौसमी सब्जियां और परम्परागत व्यंजन शामिल होते है। पारम्परिक भोजन में पोषण, औषधीय गुण और आत्मनिर्भरता की झलक मिलती है।      जनजातियों की पाक कला उनकी जीवन पद्धति पर्यावरण आजीविका और सांस्कृतिक परम्पराओं का सजीव प्रतिबिम्ब है। यह भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं बल्कि स्वास्थ्य, प्रकृति-सम्मान और...

राजस्थान की प्रमुख जनजातियां समस्याएं, चुनौतियां एवं समाधान

      भारत की सामाजिक संरचना में जनजातियाँ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं, जीवन-पद्धति एवं प्रकृति-आधारित ज्ञान के कारण एक विशेष स्थान रखती हैं। भारतीय संविधान ने इन समुदायों की विशिष्टता, संवेदनशीलता और ऐतिहासिक वंचनाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी सुरक्षा और समृद्धि हेतु विशेष प्रावधान किए हैं। तथापि, आज भी जनजातीय समाज अनेक बहुआयामी समस्याओं- आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक और राजनीतिक-का सामना कर रहा है। ये समस्याएँ केवल गरीबी या संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि औपनिवेशिक इतिहास, विकास परियोजनाओं, आधुनिकता के दबाव, प्रशासनिक उपेक्षा तथा भूमंडलीकरण जैसे व्यापक कारकों से उत्पन्न हुई हैं।        भारत के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित राजस्थान अपनी सांस्कृतिक विविधता, ऐतिहासिक परम्पराओं और समृद्ध आदिवासी विरासत के लिए विश्व प्रसिद्ध है। राज्य की कुल जनसंख्या में लगभग 13% हिस्सा जनजातीय समुदायों का है, जो मुख्य रूप से अरावली पर्वतमाला के वनक्षेत्रों, दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी जिलों में निवास करते हैं। भील, मीणा, गरासिया, सहरिया...