डामोर जनजाति: इतिहास, संस्कृति एवं कला का एक समग्र अध्ययन
सारांश - भारत की जनजातीय संस्कृति उसकी बहुलतावादी सामाजिक संरचना का महत्वपूर्ण आधार है। डामोर जनजाति, जो भील जनजातीय समूह की एक प्रमुख उप जनजाति है, पश्चिमी भारत विशेषकर राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करती है। यह शोध-पत्र डामोर जनजाति के ऐतिहासिक विकास, सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन, कला परंपराओं, धार्मिक विश्वासों तथा समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि डामोर जनजाति की संस्कृति प्रकृति-आधारित जीवन दर्शन, सामुदायिक सहभागिता और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों पर आधारित है। वर्तमान समय में आधुनिकीकरण, शहरीकरण एवं वैश्वीकरण के प्रभाव से इस जनजाति की सांस्कृतिक पहचान पर संकट उत्पन्न हो रहा है।
अतः इस शोध का उद्देश्य डामोर जनजाति की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं प्रलेखन की आवश्यकता को रेखांकित करना है।
मुख्य शब्द : डामोर जनजाति, भील, जनजातीय संस्कृति, लोक कला, स्वदेशी ज्ञान प्रणाली, सांस्कृतिक संरक्षण
भूमिका - भारत को जनजातियों का देश कहा जाता है, जहाँ विविध भौगोलिक, भाषाई और सांस्कृतिक परिवेश में रहने वाली जनजातियाँ अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। डामोर जनजाति भी ऐसी ही एक महत्वपूर्ण जनजाति है, जिसने अपने पारंपरिक जीवन मूल्यों को आज तक काफी हद तक संरक्षित रखा है।
डामोर जनजाति का जीवन जंगल, पहाड़, कृषि और पशुपालन पर आधारित रहा है। इनकी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना सामूहिकता, समानता और प्रकृति के प्रति सम्मान पर आधारित है। इस शोध-पत्र में डामोर जनजाति के ऐतिहासिक विकास, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक परंपराओं और कला रूपों का विस्तृत अध्ययन किया गया है।
अध्ययन के उद्देश्य-
1.डामोर जनजाति के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करना।
2.डामोर जनजाति की सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना का विश्लेषण करना।
3.डामोर जनजाति की लोक कला, संगीत एवं नृत्य परंपराओं का अध्ययन करना।
4.पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की भूमिका को समझना।
5.समकालीन चुनौतियों एवं संरक्षण की संभावनाओं पर प्रकाश डालना।
शोध पद्धति - प्रस्तुत अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है। इसमें पुस्तकों, शोध-पत्रिकाओं, सरकारी रिपोर्टों, जनजातीय अध्ययन संस्थानों के प्रकाशनों तथा पूर्ववर्ती शोध कार्यों का उपयोग किया गया है। साथ ही वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाया गया है।
डामोर जनजाति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य डामोर जनजाति को भील समूह की एक शाखा माना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से भील जनजाति को भारत की प्राचीनतम जनजातियों में स्थान प्राप्त है। डामोरों का निवास मुख्यतः अरावली पर्वतमाला के दक्षिणी भाग में रहा है।
इतिहासकारों के अनुसार, डामोर जनजाति ने बाहरी आक्रमणों और शासकीय नियंत्रण का समय-समय पर प्रतिरोध किया। मध्यकाल में कई डामोर सरदारों ने स्थानीय रियासतों के विरुद्ध संघर्ष किया। ब्रिटिश शासन काल में इन्हें वन क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया, जिससे इनकी पारंपरिक आजीविका प्रभावित हुई।
भौगोलिक विस्तार - डामोर जनजाति का प्रमुख निवास क्षेत्र निम्नलिखित है-
राजस्थान: डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर
गुजरात: दाहोद, पंचमहल
मध्य प्रदेश: झाबुआ, अलीराजपुर
इन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति पहाड़ी एवं वनाच्छादित है, जिसने डामोर जनजाति के जीवन-यापन और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है।
सामाजिक संरचना - डामोर समाज पितृसतात्मक है। परिवार प्रायः संयुक्त होते हैं। समाज में गोत्र व्यवस्था प्रचलित है तथा समान गोत्र में विवाह निषिद्ध माना जाता है।
विवाह प्रथा- डामोर जनजाति में विवाह सामाजिक सहमति और पारिवारिक सहभागिता से संपन्न होता है। प्रेम विवाह और पारंपरिक विवाह दोनों प्रचलित हैं।
पंचायत व्यवस्था- गांव की पंचायत सामाजिक विवादों का समाधान करती है और सामाजिक नियंत्रण का माध्यम होती है।
डामोर जनजाति की संस्कृति-
भाषा- डामोर जनजाति की प्रमुख भाषा वागड़ी है, जो भीली भाषा समूह से संबंधित है।
वेशभूषा एवं आभूषण- पुरुष धोती, अंगरखा और पगड़ी पहनते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगे घाघरे, ओढ़नी और चांदी के आभूषण धारण करती हैं।
खान-पान- इनका भोजन मक्का, बाजरा, ज्वार, दाल, साग-सब्जियों पर आधारित होता है। महुआ से निर्मित पेय सामाजिक एवं धार्मिक अवसरों पर प्रयोग में लाया जाता है।
धार्मिक विश्वास एवं पर्व-त्योहार- डामोर जनजाति प्रकृति-पूजक है। पेड़, पहाड़, नदी और पूर्वजों की पूजा की जाती है।
प्रमुख पर्व—
A.होली B.दिवाली .C रक्षाबंधन D.गवरी पर्व
डामोर जनजाति की कला एवं लोक परंपराएँ-
लोक नृत्य - गवरी नृत्य डामोर जनजाति की सबसे प्रसिद्ध नृत्य परंपरा है, जो धार्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
लोक संगीत- मांदल, ढोल, थाली और बाँसुरी प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। गीतों में वीरता, प्रेम, प्रकृति और सामाजिक जीवन का चित्रण मिलता है।
शिल्प एवं चित्रकला- डामोर जनजाति की कला में दीवार चित्रांकन, बांस शिल्प, लकड़ी के औजार और मिट्टी के बर्तन प्रमुख हैं।
पारंपरिक ज्ञान प्रणाली - डामोर जनजाति के पास औषधीय पौधों का गहन ज्ञान है। कृषि, मौसम पूर्वानुमान और वन संरक्षण की पारंपरिक विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
समकालीन चुनौतियाँ-
A.शिक्षा की कमी
B.आर्थिक पिछड़ापन
C.भूमि एवं वन अधिकारों की समस्या
D.सांस्कृतिक क्षरण
संरक्षण एवं विकास की संभावनाएँ (Preservation and Development)
A.जनजातीय संस्कृति का दस्तावेजीकरण
B.शिक्षा और कौशल विकास
C.लोक कला को बाजार से जोड़ना
D.सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन
निष्कर्ष - डामोर जनजाति की संस्कृति भारतीय जनजातीय विरासत की अमूल्य धरोहर है। इसके इतिहास, संस्कृति और कला का संरक्षण न केवल जनजातीय समाज के लिए, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति के लिए आवश्यक है।
संदर्भ सूची -
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10.राजस्थान जनजातीय अनुसंधान संस्थान प्रकाशन
।। Dr. Kantilal Ninama ।।
Lecturer - HISTORY (vsy)
Govind Guru tribal University
Banswara, Rajasthan



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