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नवंबर 23, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जनजातीय विरासत स्वदेशी ज्ञान और परंपरागत औषधीय ज्ञान का एक ऐतिहासिक अध्ययन

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      राजस्थान का जनजाति बहुल वाग्वर अंचल दक्षिणी राजस्थान अपने पुरातत्व, शिल्प स्थापत्य, आदिम संस्कृति के साथ ही समृद्ध इतिहास के लिए प्रदेश में ख्यातनाम रहा है। दक्षिणी राजस्थान में जनजातीय समाज कई जातियों, उपजातियो और वर्गों में विभक्त है। समाज की मूल इकाई परिवार है। यहां की आदिवासी आबादी सुदूर पहाडी क्षेत्रों में बिखरी हुई बस्तियों में ढाणी एवं फलों में रहती है। आदिवासी समाज कई सामाजिक बुराईयों, अंध-विश्वास, डायन प्रथा, तंत्र मंत्र, बाल विवाह, निरक्षरता, गरीबी, अज्ञानता और बेरोजगारी से जकड़ा हुआ है। पारिवारिक स्वतंत्रता, अपनी इच्छानुसार निवास एवं रहन सहन आदिवासी समाज की विशेषता है।         नैसर्गिक सौन्दर्य श्री से लकदक वागड अंचल रणमीय पहाडियों से घिरा हुआ है। चितराई उपत्यकाओं के बीच विविध जलाशय और उनमें कलरव करते  देशी-विदेशी परिन्दें जहां इस अंचल की नैसर्गिक सुषमा में अभिवृद्धि करते है वहीं मनोहारी आदिम सस्कृति और परम्पराओं के साथ-साथ मेलो, पर्वो और उत्सवों में उन्मक्त मन से शिरकत करते यहां के आदिवासियों की किलकाकारियां वर्ष भर इस अंचल की नी...

वागड़ सेवा संघ के माध्यम से भील जनजाति का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

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       राजस्थान का यह सुदूर दक्षिणी भाग वागड़ प्रदेश के नाम से विख्यात है। आदिवासी भील बहूल यह क्षेत्र आधुनिक चमक-दमक से कटा हुआ अवश्य है तथापि प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा अक्षुण्ण बनाए रखने में यह अग्रणी है। वागड़ की जनजातियों ने अपनी सांस्कृतिक परम्परा, गीत, कथा, केवते एवं नृत्य की धरोहर को आज भी संजोएं रखा है। अनेक धार्मिक आस्थाओं और विश्वासों से प्रकट होता है कि जनजातीय सामाजिक जीवन सोलह संस्कारों से बंधा हुआ है। लगभग 80 प्रतिशत भील जनजाति आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23°.1 से 24°.1 उत्तरी अक्षांश एवं 73°.1 से 74°.1 पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर, पूर्व में मध्य प्रदेश तथा दक्षिणी पश्चिम में गुजरात राज्य की सीमाएं लगी हुई है। इसका क्षेत्रफल करीब 4000 वर्गमील है। जातियों की विविधता और उनकी विचित्रताओं के मामलों में राजस्थान एक समृद्ध प्रदेश रहा है। जातियों का निर्माण उनकी सामाजिक प्रथायें तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़े जमाये हुए है। बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में भीलों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। वे रियासती दम...