सतत विकास में आदिवासी स्वदेशी ज्ञान का महत्व
आदिवासी देशज ज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) वह अनुभवजन्य, स्थानीय और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित ज्ञान है जो प्रकृति, समाज और आजीविका के बीच संतुलन पर आधारित है। सतत विकास (Sustainable Development) के संदर्भ में यह ज्ञान अत्यंत प्रासंगिक और प्रभावी है। 1.प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग- आदिवासी समुदाय जंगल, जल, भूमि और जैव-विविधता का उपयोग संरक्षण के सिद्धांत पर करते हैं। * सामुदायिक वन प्रबंधन *नियंत्रित शिकार व संग्रह *जलस्रोतों की पवित्रता और संरक्षण ये सभी आज के पर्यावरणीय संकट (जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई) के समाधान में सहायक हैं। 2.पारंपरिक कृषि और खाद्य सुरक्षा- आदिवासी कृषि पद्धतियाँ जैसे- *मिश्रित खेती (Mixed Cropping) *देशी बीजों का संरक्षण *जैविक खाद और कीटनाशक ये पद्धतियाँ मृदा उर्वरता, जल संरक्षण और पोषण सुरक्षा को बनाए रखती हैं। 3.जैव-विविधता संरक्षण- आदिवासी ज्ञान में औषधीय पौधों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की गहरी समझ है। *लोक औषधि *बीज संरक्षण...