पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी: चुनौतियां और संभावनाएं

प्रस्तावना- भारत की ग्राम-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में पंचायती राज संस्थाएँ शासन की सबसे निचली, लेकिन सबसे प्रभावी इकाइयाँ हैं। इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय विकास, सामाजिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र को वास्तविक रूप मिलता है।
  भारत के कुल जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय समाज से आता है, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना विशिष्ट रही है। इस समाज में महिलाओं की भूमिका परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रही है, किंतु औपचारिक राजनीतिक संरचनाओं में उनकी भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही।
  73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए पृथक प्रावधानों ने जनजातीय महिलाओं को स्थानीय शासन में प्रवेश का अवसर प्रदान किया। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर अनेक संरचनात्मक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। प्रस्तुत लेख में पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी की वर्तमान स्थिति, मुख्य चुनौतियाँ तथा भविष्य की संभावनाएँ का विश्लेषण किया गया है।


पंचायती राज व्यवस्थाः एक संक्षिप्त परिचय-पंचायती राज व्यवस्था भारत में स्थानीय स्वशासन की संवैधानिक व्यवस्था है। 1992 में पारित 73वां संविधान संशोधन अधिनियम इसके लिए मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इसके प्रमुख बिंदु हैं-
*ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद का त्रि-स्तरीय ढाँचा
*महिलाओं के लिए कम से कम 33% आरक्षण (कई राज्यों में 50%)
*अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण
*ग्राम सभा की सशक्त भूमिका
    अनुसूचित क्षेत्रों में PESA अधिनियम, 1996 ने ग्राम सभा और स्थानीय समुदायों को विशेष अधिकार प्रदान किए, जिससे जनजातीय महिलाओं की भागीदारी के लिए अतिरिक्त अवसर बने।

जनजातीय महिलाओं की सामाजिक स्थिति-
   जनजातीय समाज में महिलाओं की स्थिति अन्य ग्रामीण समाजों की तुलना में कई मामलों में अधिक स्वायत्त रही है। वे कृषि, वनोपज संग्रह, पारिवारिक निर्णय और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं। इसके बावजूद
A.औपचारिक शिक्षा की कमी
B.आधुनिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं से दूरी
C.संसाधनों तक सीमित पहुँच
  ने उन्हें राजनीतिक नेतृत्व से दूर रखा। पंचायतों में प्रवेश के बाद यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है, किंतु परिवर्तन की गति समान नहीं है।

पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारीः स्वरूप- पंचायतों में जनजातीय महिलाओं की भागीदारी विभिन्न रूपों में दिखाई देती है-
A. निर्वाचित प्रतिनिधि (सरपंच, वार्ड पंच)
B. ग्राम सभा में सहभागिता
C. विकास योजनाओं की निगरानी
D. स्वयं सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से                    सामुदायिक     नेतृत्व
      कई क्षेत्रों में जनजातीय महिला सरपंचों ने शिक्षा, स्वच्छता, जल प्रबंधन और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर सकारात्मक पहल की है।

प्रमुख चुनौतियाँ-
1.शिक्षा और जागरूकता की कमी - अनेक जनजातीय क्षेत्रों में महिला साक्षरता दर कम है। प्रशासनिक दस्तावेज़, बजट प्रक्रिया और योजनाओं की तकनीकी भाषा उनकी प्रभावी भागीदारी में बाधा बनती है।
2.सामाजिक और सांस्कृतिक बंधन- हालाँकि जनजातीय समाज अपेक्षाकृत खुला माना जाता है, फिर भी-
पितृसत्तात्मक सोच
पारिवारिक दबाव
परंपरागत भूमिकाएँ
महिलाओं के स्वतंत्र निर्णय को सीमित करती हैं।
3.प्रतिनिधित्व बनाम वास्तविक शक्ति- कई मामलों में "प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व" देखने को मिलता है, जहाँ निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह पति या परिवार के पुरुष सदस्य निर्णय लेते हैं।
4.आर्थिक निर्भरता- आर्थिक संसाधनों की कमी और आय के सीमित स्रोत महिलाओं को स्वतंत्र नेतृत्व से रोकते हैं।
5.प्रशासनिक जटिलताएँ- पंचायती कार्यप्रणाली की जटिलता, तकनीकी प्रक्रियाएँ और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सीमित ज्ञान भागीदारी को प्रभावित करता है।

संभावनाएँ और अवसर-
A. संवैधानिक और कानूनी समर्थन- आरक्षण व्यवस्था ने जनजातीय महिलाओं को राजनीतिक मंच प्रदान किया है। PESA अधिनियम ने ग्राम सभा को सशक्त बनाकर महिलाओं की "वाज़ को महत्व दिया है।
B. शिक्षा और क्षमता निर्माण- सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रम, नेतृत्व विकास कार्यशालाएँ और डिजिटल साक्षरता पहलें महिलाओं को सशक्त बना रही हैं।
C. स्वयं सहायता समूह और आजीविका - SHG के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण ने महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाया है, जिसका सीधा प्रभाव पंचायतों में उनकी सक्रियता पर पड़ा है।
D. सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया- नई पीढ़ी की जनजातीय महिलाएँ शिक्षा और संचार माध्यमों के कारण अधिक जागरूक हो रही हैं, जिससे नेतृत्व की गुणवत्ता में सुधार हो रहा है।
E. स्थानीय विकास में प्रभावी भूमिका- जल संरक्षण, स्वच्छता, पोषण, शिक्षा और वन अधिकार जैसे मुद्दों पर महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी से स्थायी विकास को बढावा मिला है।
ग्राम सभा और जनजातीय महिलाएँ-
ग्राम सभा जनजातीय क्षेत्रों में लोकतंत्र की आत्मा है।
यहाँ-
*महिलाओं की उपस्थिति
*सामूहिक निर्णय
*पारदर्शिता
    ने शासन को अधिक उत्तरदायी बनाया है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से सामाजिक मुद्दों पर संवेदनशीलता बढ़ी है।

केस उदाहरण (सामान्यीकृत)- राजस्थान, मध्य प्रदेश
और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अनेक जनजातीय महिला
सरपंचों ने-
A.स्कूल नामांकन बढ़ाया
B.पेयजल योजनाएँ लागू कीं
C.स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाए
   ये उदाहरण दर्शाते हैं कि उचित समर्थन मिलने पर महिलाएँ प्रभावी नेतृत्व कर सकती हैं।

नीतिगत सुझाव-
*निरंतर प्रशिक्षण और मार्गदर्शन
*डिजिटल और वित्तीय साक्षरता
*प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व पर नियंत्रण
*स्थानीय भाषा में प्रशासनिक सामग्री
*महिला नेटवर्क और मंचों का निर्माण.

पंचायती राज, IKS और जनजातीय महिला नेतृत्व
   भारतीय ज्ञान परंपरा में सामुदायिक निर्णय, प्रकृति-सम्मत विकास और सहभागिता पर बल दिया गया है। जनजातीय महिलाओं का नेतृत्व इन मूल्यों को आधुनिक शासन से जोड़ता है, जिससे समावेशी और टिकाऊ विकास संभव होता है।

निष्कर्ष - पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी भारत के ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यद्यपि शिक्षा, सामाजिक बंधन और प्रशासनिक चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, फिर भी संवैधानिक प्रावधान, क्षमता निर्माण और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। यदि नीति-निर्माण और क्रियान्वयन में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो पंचायती राज व्यवस्था सशक्त, उत्तरदायी और समावेशी बन सकती है।
   बीसवीं शताब्दी में नारी सशक्तीकरण हेतु अनेक प्रयास किये गये। महिलाएं इससे लाभान्वित भी हुई है। उन्होंने सभी क्षेत्रों में आशातीत प्रगति की। तथापि आज भी बहुत अधिक संख्या में महिलाएं गरीब है, अनपढ़ है। उन्हें न तो अपने अधिकारों का ज्ञान है और न ही उनअधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का। दरअसल, सशक्तीकरण की आवश्यक शर्ते है- शिक्षा और आर्थिक आत्म निर्भरता, लेकिन समाज की रूढ़िबद्धता उसके मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है। आज जनजातीय महिलाओं के पिछड़ेपन के कई कारण है जिनमें से एक बड़ा कारण उनका अशिक्षित डोना और समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियां होना है।

संदर्भ (Indicative)-
भारतीय संविधान, 73वां संशोधन
2.PESA अधिनियम, 1996
3.शर्मा, रोमी (2002) " भारतीय महिलाएं नई दिशाएं " प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार,
4.निशान्त सिंह (2011) " सामाजिक सुरक्षा और महिलाएं " खुशी पब्लिकेशन्स, गाजियाबाद नई दिल्ली
5.शुक्ल, प्रवीण (2009) " महिला सशक्तिकरण बाधाए एवं संकल्प" आर के पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली.
6.शैण्डे, हरीदास रामजी 'सुदर्शन' (2009) "नारी सशक्तीकरण" कंगना प्रकाशन भवन, नेहरू नगर जयपुर
7.शर्मा, सुरेन्द्र कुमार (2010)" महिलाओं में अधिकारों के प्रति चेतना' आरबी. एस. ए. पब्लिशर्स, जयपुर
8.शर्मा, रमा/मिश्रा एम. के. (2012) महिलाओं के मौलिक अधिकार अर्जुन पब्लिशिंग हाउस, अंसारी रोड, नई दिल्ली
9.रस्तोगी, अलका (2005) आदिवासी सामाजिक संरचना एवं महिलाओं की प्रस्थिति हिमांशु पब्लिकेशन्स उदयपुर
10वर्मा, गुप्ता (2005) महिला जागृति और सशक्तीकरण आविष्कार पब्लिशर्स डिस्ट्रीब्यूटर्स जयपुर.



           kantilal Ninama
           Lecturer - History
          Govt. College- Ghatol
            Banswara Rajasthan.

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
very nice article
बेनामी ने कहा…
Very good

wwwtribalcultureheritage.com

आदिवासी विकास:चिंतन और सरोकार

भारतीय जनजातियों की जीवनशैली एवं परंपराएं

वागड़ की भील जनजाति-इतिहास के परिप्रेक्ष्य में

भील जनजाति का सामाजिक संगठन एवं सामुदायिक भावना

गोविन्द गिरी का भगत आंदोलन और मानगढ़ हत्याकांड

वागड़ सेवा संघ के माध्यम से भील जनजाति का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

आदिवासी लोक संस्कृति में भील जनजाति के लोकगीतों एवं लोकनृत्यों का ऐतिहासिक महत्व

आदिवासी विकास हेतु भारतीय संविधान में उल्लेखित प्रमुख प्रावधान

भील जनजाति में दीपावली का त्यौहार एवं सामाजिक महत्व

दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी समाज में विवाह की अनूठी परम्परा -"नोतरा प्रथा" गांव वाले एवं रिश्तेदार करते है मदद