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जनवरी 25, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी: चुनौतियां और संभावनाएं

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प्रस्तावना- भारत की ग्राम-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में पंचायती राज संस्थाएँ शासन की सबसे निचली, लेकिन सबसे प्रभावी इकाइयाँ हैं। इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय विकास, सामाजिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र को वास्तविक रूप मिलता है।   भारत के कुल जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय समाज से आता है, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना विशिष्ट रही है। इस समाज में महिलाओं की भूमिका परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रही है, किंतु औपचारिक राजनीतिक संरचनाओं में उनकी भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही।   73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए पृथक प्रावधानों ने जनजातीय महिलाओं को स्थानीय शासन में प्रवेश का अवसर प्रदान किया। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर अनेक संरचनात्मक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। प्रस्तुत लेख में पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी की वर्तमान स्थिति, मुख्य चुनौतियाँ तथा भविष्य की संभावनाएँ का विश्लेषण किया गया है। पंचायती राज व्यवस्थाः एक संक्षिप्त परिचय- पंचायती राज व्यवस्था भारत में स्थानीय स्वशासन की...

सतत् विकास में आदिवासी स्वदेशी ज्ञान का महत्वः पर्यावरण, संस्कृति और आजीविका का समन्वय

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     आदिवासी देशज ज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) वह अनुभवजन्य, स्थानीय और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित ज्ञान है जो प्रकृति, समाज और आजीविका के बीच संतुलन पर आधारित है। सतत विकास (Sustainable Development) के संदर्भ में यह ज्ञान अत्यंत प्रासंगिक और प्रभावी है। 1.प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग-       आदिवासी समुदाय जंगल, जल, भूमि और जैव-विविधता का उपयोग संरक्षण के सिद्धांत पर करते हैं। * सामुदायिक वन प्रबंधन *नियंत्रित शिकार व संग्रह *जलस्रोतों की पवित्रता और संरक्षण       ये सभी आज के पर्यावरणीय संकट (जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई) के समाधान में सहायक हैं। 2.पारंपरिक कृषि और खाद्य सुरक्षा-     आदिवासी कृषि पद्धतियाँ जैसे- *मिश्रित खेती (Mixed Cropping) *देशी बीजों का संरक्षण *जैविक खाद और कीटनाशक     ये पद्धतियाँ मृदा उर्वरता, जल संरक्षण और पोषण सुरक्षा को बनाए रखती हैं। 3.जैव-विविधता संरक्षण-     आदिवासी ज्ञान में औषधीय पौधों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की गहरी समझ है। *लोक औषधि *बीज संरक्षण...

आदिवासी देशज ज्ञान: भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास में योगदान NEP2 020 के संदर्भ में

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    भारतीय ज्ञान प्रणाली का विकास विभिन्न शास्त्रीय, लोक एवं देशज परंपराओं के समन्वय से हुआ है, जिसमें राजस्थान के आदिवासी समाजों- भील, मीणा, गरासिया, डामोर एवं सहरिया - द्वारा विकसित देशज ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यह ज्ञान मुख्यतः अनुभवजन्य, मौखिक तथा प्रकृति-आधारित रहा है, जिसने कृषि, जल-संसाधन प्रबंधन, वन संरक्षण, औषधीय ज्ञान, लोकचिकित्सा एवं सामाजिक संगठन के क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान प्रणाली को व्यवहारिक आधार प्रदान किया।     भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System - IKS) केवल शास्त्रीय ग्रंथों, वेदों या दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भारत के आदिवासी समाजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित लोकज्ञान (Indigenous Knowledge) का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आदिवासी लोकज्ञान प्रकृति, समाज और जीवन के साथ संतुलन पर आधारित एक व्यावहारिक ज्ञान प्रणाली है, जिसने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया है।     आज जब सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और वैकल्पिक ज्ञान प्रणालियों की आवश्यकता बढ़ रही है, तब आदिवासी लोकज्ञान का महत्व और भी बढ़ जाता है।    यह ऐत...