राजस्थान की प्रमुख आदिवासी भील और गरासिया जनजातियों के वाद्य यंत्र और उनका सांस्कृतिक महत्व

     राजस्थान की आदिवासी जनजातियां भारत की आदिम जनजातियां हैऔर देश की सभ्यता एवं संस्कृति  को बनाए रखने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जनजातियों के लोक गीतों एवं नृत्यों में वाद्य यंत्रों का स्थान सर्वोपरि है। राजस्थान की आदिवासी जनजातियों (भील, मीणा, डामोर गरासिया आदि) के प्रमुख वाद्य यंत्रों में मांदल (मिट्टी का ढोल), ढोल, कुंडी, थाली, शहनाई, पवारी (सींग व लकड़ी का वाद्य), और डोवला (बांसुरीनुमा) शामिल हैं, जो उनके पारंपरिक गीतों, नृत्यों (जैसे गवरी) और धार्मिक अनुष्ठानों का अभिन्न अंग हैं, हालांकि आधुनिकता के प्रभाव से इनका प्रचलन कम हो रहा है।
     राजस्थान के लोक संगीत में यहाँ के लोकवाद्यों का महत्वपूर्ण स्थान है। इनके प्रयोग से गीतों व नृत्यों में माधुर्य वृद्धि होतो है साथ ही वातावरण एवं भावाभिव्यक्ति प्रभावशाली बनती है। यहाँ के परिवेश, स्थिति व भावों के अनुरूप लोक वाद्यों का प्रचुर विकास हुआ है। 

भील जनजाति के प्रमुख लोक वाद्य यंत्र
    भारत की आदिवासी संस्कृति में संगीत और वाद्य यंत्र केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक-धार्मिक जीवन की आत्मा हैं। भील जनजाति - जो राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के विस्तृत भू-भाग में निवास करती है - अपने विशिष्ट लोक संगीत, नृत्य और वाद्य परंपराओं के लिए जानी जाती है। भील समाज के पर्व-त्योहार, विवाह, अनुष्ठान, कृषि चक्र और सामुदायिक उत्सव लोक वाद्यों के बिना अधूरे माने जाते हैं। इन वाद्यों के माध्यम से सामूहिक स्मृति, वीर गाथाएँ, प्रेम-विरह, प्रकृति-पूजन और लोकविश्वास अभिव्यक्त होते हैं।

भील समाज में संगीत का स्थान- 
    भील जीवन प्रकृति-केंद्रित है। जंगल, पहाड़, नदी और ऋतुएँ उनके गीत-संगीत की प्रेरणा हैं। संगीत सामाजिक एकता को मजबूत करता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान के हस्तांतरण का माध्यम बनता है। लोक वाद्य न केवल लय प्रदान करते हैं, बल्कि नृत्य की गति, गीत की भावभूमि और अनुष्ठानों की पवित्रता भी तय करते हैं।

भील लोक वाद्यों का वर्गीकरण- भील जनजाति में प्रचलित वाद्य यंत्रों को भारतीय शास्त्रीय वर्गीकरण के अनुसार तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा जा सकता है।
अवनद्ध वाद्य (ताल वाद्य): मांडल, ढोल, टिमकी आदि।
सुषिर वाद्य (फूँक वाद्य): बाँसुरी
तंत्री वाद्यः रावणहत्था
     इसके अतिरिक्त घन वाद्य (झांझ, मंजीरा, थाली) भी व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं।

प्रमुख लोक वाद्य यंत्र- 
1.  मांडल (मांदल)- मांडल भील जनजाति का सर्वाधिक लोकप्रिय और पहचान-सूचक ताल वाद्य है। यह लकड़ी के खोखले बेलनाकार ढाँचे पर दोनों ओर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है। एक ओर मोटा और दूसरी ओर पतला चमड़ा होने से विभिन्न स्वर उत्पन्न होते हैं।
उपयोगः गवरी नृत्य, भगोरिया पर्व, विवाह और सामूहिक नृत्य।
सांस्कृतिक महत्वः  मांडल की ताल पर नृत्य सामूहिक ऊर्जा का प्रतीक है। इसे बजाने की परंपरा अनुभवी वादकों से युवाओं तक मौखिक प्रशिक्षण द्वारा पहुँचती है।
2. ढोल- ढोल भील समाज में उत्सवों और सामाजिक आयोजनों का मुख्य ताल वाद्य है। यह बड़े आकार का होता है और कंधे पर लटकाकर या भूमि पर रखकर बजाया जाता है।
उपयोगः विवाह, मेले, जुलूस, गाथाओं का गायन।
महत्वः ढोल की गूंज आह्वान और उल्लास का संकेत देती है।

3.टिमकी / टिम्बा- यह छोटा ताल वाद्य है, जिसे मांडल या ढोल के साथ सहायक ताल के रूप में बजाया जाता है।
उपयोगः तेज़ लय वाले नृत्य और समूह गायन।
विशेषताः हल्का और पोर्टेबल होने से युवाओं में लोकप्रिय।
4.थाली- पीतल या कांसे की थाली को लकड़ी की छड़ी से बजाकर लय उत्पन्न की जाती है।
उपयोगः लोक नृत्य, भजन और सामूहिक गीत।
महत्वः सरल साधन होने के कारण यह घर-घर में उपलब्ध रहता है।
5. झांझ / मंजीरा- धातु से बने छोटे घन वाद्य।
उपयोगः नृत्य के दौरान ताल-नियंत्रण।
महत्वः गीत की गति और लय को स्थिर रखते हैं।
6.बाँसुरी (फुलिया)- बाँस से बनी बाँसुरी भील लोकजीवन में प्रकृति और प्रेम का प्रतीक है।
उपयोगः चरवाहों द्वारा, एकल वादन, प्रेम गीत।
विशेषताः सरल स्वर-संरचना, भावनात्मक अभिव्यक्ति।
7. रावणहत्था- तंत्री वाद्य रावणहत्था का प्रयोग कुछ भील क्षेत्रों में लोक कथाओं और वीर गाथाओं के गायन में होता है।
संरचनाः नारियल/लकड़ी का खोखला पात्र, एक-दो तार, धनुषाकार गज।
महत्वः कथात्मक गायन में भाव-गंभीरता जोड़ता है।

 पर्व-त्योहार और वाद्य- भील समाज के पर्व जैसे भगोरिया, गवरी, नवरात्र, होली आदि में लोक वाद्यों की केंद्रीय भूमिका होती है। प्रत्येक पर्व के लिए वाद्य-संयोजन और लय भिन्न होती है, जिससे पर्व की पहचान बनती है।

लोकनृत्य और वाद्ययंत्र- भील नृत्य सामूहिक होते हैं। मांडल-ढोल की ताल पर वृत्ताकार नृत्य सामाजिक समरसता को दर्शाते हैं। झांझ-मंजीरा लय को सुदृढ़ करते हैं, जबकि बाँसुरी भावनात्मक विराम देती है।
निर्माण परंपरा और सामग्री- वाद्य निर्माण स्थानीय संसाधनों—लकड़ी, बाँस, चमड़ा, धातु—से होता है। यह परंपरा कारीगर परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। आधुनिक बाज़ार गव के बावजूद पारंपरिक तकनीकें आज भी जीवित है।
गुरु-शिष्य परंपरा- वाद्य वादन का प्रशिक्षण औपचारिक नहीं, बल्कि परिवार और समुदाय के भीतर मौखिक परंपरा से मिलता है। अभ्यास उत्सवों और सामुदायिक आयोजनों के दौरान होता है।

आधुनिकता का प्रभाव- आधुनिक संगीत उपकरणों और मंचीय प्रस्तुतियों ने पारंपरिक वाद्यों के उपयोग को चुनौती दी है। फिर भी लोक महोत्सव, सांस्कृतिक उत्सव और अकादमिक प्रयासों से संरक्षण संभव हो रहा है।
संरक्षण और संवर्धन- 
*स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहन
*विद्यालय/महाविद्यालय स्तर पर लोक संगीत पाठ्यक्रम
*डिजिटल अभिलेखन और डॉक्यूमेंटेशन
*लोक कलाकारों के लिए मंच और अनुदान
निष्कर्ष- भील जनजाति के लोक वाद्य यंत्र उनकी सांस्कृतिक आत्मा के संवाहक हैं। ये वाद्य सामूहिक पहचान, परंपरा और जीवन-दर्शन को जीवित रखते हैं। संरक्षण और समकालीन प्रस्तुति के संतुलन से यह विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकती है।

गरासिया जनजाति के वाद्य यंत्र -
   गरासिया जनजाति के प्रमुख लोक वाद्य यंत्र उनकी सांस्कृतिक परंपरा, लोक नृत्य, गीत तथा पर्व-त्योहारों से गहराई से जुड़े हुए हैं। दक्षिणी राजस्थान (सिरोही, उदयपुर, पिंडवाड़ा क्षेत्र), गुजरात और मध्यप्रदेश में निवास करने वाली गरासिया जनजाति में निम्नलिखित वाद्य विशेष रूप से प्रचलित हैं-
 गरासिया जनजाति के प्रमुख वाद्य यंत्र
मांडल (मांदल)- गरासिया जनजाति का सबसे प्रमुख ताल वाद्य। यह लकड़ी का बना होता है और दोनों ओर चमड़ा मढ़ा जाता है। उपयोगः गरासिया लोक नृत्य, विवाह, भगोरिया, मेलों में। महत्वः नृत्य की लय और सामूहिक उत्साह का मुख्य आधार।
ढोल- ढोल गरासिया समाज में उत्सवों और सामाजिक आयोजनों का अनिवार्य वाद्य है।
उपयोगः विवाह, जुलूस, समारोह और नृत्य 
विशेषताः तेज़ और गूंजदार ताल।
टिमकी / टिम्बा- छोटे आकार का ताल वाद्य, जो मांडल और ढोल के साथ सहायक ताल देता है।
उपयोगः तेज़ लय वाले लोक नृत्य।
थाली- पीतल या कांसे की थाली को लकड़ी की छड़ी से बजाया जाता है।
उपयोगः लोक गीत, नृत्य और सामूहिक गायन।
महत्वः सरल एवं सुलभ ताल वाद्य।
झांझ / मंजीरा- धातु से बने छोटे घन वाद्य।
उपयोगः नृत्य और भजन में ताल बनाए रखने हेतु।
बाँसुरी (फुलिया)- बाँस से बनी बाँसुरी गरासिया लोकजीवन में प्रेम, प्रकृति और विरह की भावनाओं को व्यक्त करती है।
उपयोगः एकल वादन, चरवाहों द्वारा, लोक गीतों में।
रावणहत्था- कुछ गरासिया क्षेत्रों में प्रयुक्त तंत्री वाद्य।
उपयोगः लोक कथाओं, वीर गाथाओं और ऐतिहासिक गीतों के गायन में।
सांस्कृतिक महत्व- गरासिया जनजाति में लोक वाद्य केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा और पहचान के प्रतीक हैं। ये वाद्य जनजातीय जीवन की लय को दर्शाते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा से सुरक्षित रहे हैं।
सारांश - भील एवं गरासिया जनजाति दक्षिण राजस्थान की प्रमुख आदिवासी जनजातियां है।आदिवासी समुदाय में कई प्राचीन वाद्य यंत्र प्रचलित थे। इनमें ढोल, कुंडी, थाली और शहनाई प्रमुख हैं। ये वाद्य यंत्र अक्सर समूह में मिलकर पूरे समुदाय के लिए बजाए जाते थे और संगीत तथा गैर नृत्य जैसे विभिन्न नृत्यों के माध्यम से लोगों को आपस में जोड़ते थे। लेकिन इस सदियों पुरानी परंपरा से लोगों का जुड़ाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और इसके साथ ही अपनेपन की भावना भी क्षीण होती जा रही है। इसलिए, आदिवासी समुदाय में इस परंपरा को जीवित रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। संगीत, नृत्य और सामुदायिक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए, इसे समाज में पुनः स्थापित करना आवश्यक है। लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए आदिवासी समुदाय के साथ नियमित आदान-प्रदान करना चाहिए। इन वाद्य यंत्रों को संरक्षित करने के लिए सामूहिक प्रयास से ही इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए जारी और संरक्षित किया जा सकता है।
                         डॉ कान्तिलाल निनामा 

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Nice article

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