भारत में जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में शिक्षा की भूमिकाः चुनौतियाँ और समाधान The Role of Education in the Conservation of Tribal Culture in India: Challenges and Solutions

    भारत सांस्कृतिक विविधता का एक विशाल भंडार है, जहाँ अनेक जनजातीय समुदाय सदियों से अपनी विशिष्ट परंपराओं, भाषाओं, लोककला, लोकगीतों और जीवन-शैली के साथ अस्तित्व में हैं। ये जनजातियाँ न केवल प्राकृतिक संसाधनों के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीती हैं, बल्कि उनके पास ऐसा स्वदेशी ज्ञान भी है जो सतत् विकास के लिए अत्यंत उपयोगी है।
   आधुनिक समय में वैश्वीकरण, औद्योगीकरण और शहरीकरण के प्रभाव से जनजातीय समाज की पारंपरिक संस्कृति पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। ऐसे में शिक्षा एक ऐसा माध्यम बनकर उभरती है, जिसके द्वारा जनजातीय संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन संभव है। यह लेख भारत में जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में शिक्षा की भूमिका, उससे जुड़ी चुनौतियों और संभावित समाधानों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।



जनजातीय संस्कृति का अर्थ और विशेषताएँ- 

   जनजातीय संस्कृति से तात्पर्य उस जीवन-पद्धति से है, जो किसी विशेष जनजातीय समुदाय द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाई जाती रही है। इसमें उनके रीति-रिवाज, विश्वास प्रणाली, भाषा, लोककथाएँ, नृत्य, संगीत, कला और सामाजिक संरचना
 शामिल होती है।
    भारत की प्रमुख जनजातियाँ जैसे भील, गोंड, संथाल,
 मीणा, मुंडा आदि अपनी अलग-अलग सांस्कृतिक पहचान
 रखती हैं। इनकी संस्कृति प्रकृति-केन्द्रित होती है, जहाँ जंगल
नदी, पर्वत और पशु-पक्षी उनके जीवन का अभिन्न अंग होते हैं। जनजातीय संस्कृति सामूहिकता, सहयोग और समानता 

जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में वर्तमान चुनौतियाँ
आज जनजातीय संस्कृति कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रही है—
1.भाषा का लुप्त होना- कई जनजातीय भाषाएँ लिखित रूप में उपलब्ध नहीं हैं। विद्यालयों में मातृभाषा की उपेक्षा के कारण बच्चे धीरे-धीरे अपनी भाषा से दूर हो जाते हैं।
2.पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक उपेक्षा- मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में जनजातीय इतिहास और संस्कृति को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया है, जिससे छात्रों में अपनी जड़ों से जुड़ाव कम होता जा रहा है।
3.आर्थिक और सामाजिक दबाव- गरीबी और रोजगार की तलाश में जनजातीय युवाओं का पलायन उनकी सांस्कृतिक निरंतरता को बाधित करता है।
4.डिजिटल विभाजन- तकनीकी संसाधनों की कमी के कारण जनजातीय क्षेत्रों में आधुनिक शिक्षा और डिजिटल संरक्षण की प्रक्रिया धीमी है।

*सरकारी पहल और शैक्षणिक प्रयास
भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जनजातीय शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण हेतु कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं-
A.एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय- इन विद्यालयों का उद्देश्य जनजातीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है, जिससे वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
B.जनजातीय अनुसंधान संस्थान- देश के विभिन्न राज्यों में स्थापित ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट जनजातीय संस्कृति, भाषा और परंपराओं पर शोध कार्य कर रहे हैं।
C.नई शिक्षा नीति 2020- नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा, स्थानीय ज्ञान और संस्कृति को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विशेष बल दिया गया है, जो जनजातीय समाज के लिए एक सकारात्मक कदम है।

शिक्षा के माध्यम से संरक्षण के संभावित समाधान

जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए शिक्षा को निम्नलिखित तरीकों से प्रभावी बनाया जा सकता है-
1.मातृभाषा आधारित शिक्षा- प्रारंभिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों की समझ और सांस्कृतिक जुड़ाव दोनों मजबूत होते हैं।
2.पाठ्यक्रम में स्थानीय संस्कृति का समावेश- विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्थानीय जनजातीय इतिहास,लोककला और परंपराओं को शामिल किया जाना चाहिए।
3.डिजिटल दस्तावेजीकरण- लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक ज्ञान का डिजिटल रिकॉर्ड बनाकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जा सकता है।
4.शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का आपसी संबंध- शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि 
यह समाज की सांस्कृतिक चेतना को विकसित करने का भी
महत्वपूर्ण माध्यम है। जनजातीय संस्कृति के संरक्षण में शिक्षा की भूमिका को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—
5.पाठ्यक्रम में स्थानीय संस्कृति का समावेश- विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्थानीय जनजातीय इतिहास, लोककला और परंपराओं को शामिल किया जाना चाहिए।
6.समुदाय की भागीदारी- शिक्षा प्रणाली में जनजातीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी से संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

निष्कर्ष- जनजातीय संस्कृति भारत की सांस्कृतिक विरासत की आत्मा है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो न केवल एक समुदाय बल्कि मानवता की एक अमूल्य धरोहर खो जाएगी। शिक्षा वह सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा जनजातीय संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन संभव है।

   सांस्कृतिक मूल्यों से युक्त, समावेशी और संवेदनशील शिक्षा प्रणाली ही जनजातीय समाज को सशक्त बनाकर सतत् विकास की दिशा में आगे बढ़ा सकती है। इस प्रकार शिक्षा और संस्कृति का समन्वय एक समृद्ध और संतुलित भविष्य की नींव रख सकता है।

    भारत की जनजातीय संस्कृति केवल लोकपरंपराओं, भाषा, कला और रीति-रिवाजों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह प्रकृति-केंद्रित जीवनदृष्टि, सामुदायिक सहयोग और पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध विरासत है। इस विरासत के संरक्षण में शिक्षा एक सेतु का कार्य करती है- जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करती है।
शिक्षा के माध्यम से -जनजातीय युवाओं में अपनी भाषा, लोककला, लोकसाहित्य और पारंपरिक ज्ञान के प्रति गौरवबोध विकसित होता है। स्थानीय इतिहास, लोकनायकों और सांस्कृतिक प्रतीकों को पाठ्यक्रम में शामिल कर सांस्कृतिक निरंतरता सुनिश्चित की जा सकती है।
द्विभाषिक/बहुभाषिक शिक्षा से मातृभाषा का संरक्षण होता है और साथ ही मुख्यधारा से जुड़ाव भी बढ़ता है।
डिजिटल शिक्षा और शोध के माध्यम से लोकज्ञान का दस्तावेजीकरण (Documentation) संभव होता है।
शिक्षा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण का साधन बनकर संस्कृति के क्षरण को रोकती है।
    अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि यदि शिक्षा को स्थानीय संदर्भ, मातृभाषा और पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ा जाए, तो वह जनजातीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्जीवन का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकती है। शिक्षा केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का आधार भी है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची- 

1.भारत सरकार, जनजातीय कार्य मंत्रालय. भारत में जनजातीय समुदायों की स्थिति एवं विकास. नई दिल्ली.
2.National Education Policy (NEP) 2020.
Ministry of Education, Government of India.
Xaxa, V. (2014).
3.Tribes and Social Exclusion in India.
Oxford University Press, New Delhi.
Elwin, V. (1959).
4.The Philosophy for NEFA. Shillong: Government of India Press.
Sachchidananda. (2002).
5.Tribal Education and Cultural
Preservation in India. Concept Publishing Company, New Delhi.
6.Tribal Research Institute Reports.
Documentation of Tribal Culture and
Indigenous Knowledge Systems. Various
State TRIs, India.
7.UNESCO. (2016).
8.Indigenous Knowledge and Cultural
Heritage: A Global Perspective.
9.Planning Commission of India.
Development Challenges in Tribal Areas.
Government of India.

      Author: Dr. Kantilal Ninama
     Research interest: Tribal studies,
     Indigenous Knowledge Systems,
    Panchayati Raj,tribal culture and।     Heritage,tribal History This article is based              on academic sources and                                fieldunderstanding.

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