आदिवासी विकास हेतु भारतीय संविधान में उल्लेखित प्रमुख प्रावधान
भारत विभिन्न समुदायों का एक सांस्कृतिक संगम है। जिसमें सभी पंथों, धर्मों, वर्गों एवं जातियों के विकास हेतु भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान निहित है।आदिवासियों की विशेष आवश्यकताओं को समझते हुए भारत के संविधान में इन समुदायों के हर संभव शोषण से बचाव के लिए कतिपय विशेष रक्षोपाय किए गये है और इस प्रकार सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया गया है। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत सभी को समान अधिकार और अवसर प्रदान किये गये है। अनुच्छेद 15 लिंग, धर्म, जाति, वर्ण आदि के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 15(4) किसी भी सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिक के पक्ष में जिसका राज्य की राय में राज्य के अन्तर्गत सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं है ,नियुक्तियों अथवा पदों में आरक्षण हेतु व्यवस्थाएं करे। अनुच्छेद 46 राज्य को आदेश देता है कि वह कमजोर वर्गों खासतौर पर आदिवासियों के शैक्षिक तथा आर्थिक हितों की विशेष देखभाल तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन देता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार राज्य किसी भी समुदाय को आदिवासी विनिर्दिष्ट करने हेतु आयोग गठित करने का अधिकारी है।
राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में धारा 39 में उल्लेख है कि राज्य अपनी नीति के संचालन को कियान्वित करेगा। राज्य देश के पद दलित वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों व अनुसूचित आदिम जातियों की शिक्षा और आर्थिक हितों का आरक्षण करेगा तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचायेगा। अनुसूचित जातियों और जनजातियों को संवैधानिक सुविधाएं देने के लिए बहुत बड़ी बहस हुई है। सुरक्षाएं देने के पीछे ताकतवर दलील यह थी कि आदिवासियों का शोषण एवं उत्पीड़न कई सौ वर्षों तक रहा है। स्वतंत्र भारत में प्रजातंत्र, समाजवाद और धर्म निरपेक्षता पूरी तरह से तभी आ सकती है जब हम आदिवासियों के शोषण, गरीबी और अशिक्षा का स्वाभिमान चुका दे और यह तभी संभव हो सकता है जब गैर आदिवासियों की तुलना में आदिवासियों को कुछ विशेषाधिकार दिये जाए। विकास की कुछ विशेष सहायता दी जाए पढ़ाई-लिखाई की कुछ विशेष प्राथमिकताएं दी जायें। संवैधानिक सुरक्षाएं देने की एक दूसरी दलिल भी थी। इस दलिल का कहना था कि आदिवासियों को विकास के ऐसे अवसर दिये जाए कि कुछ वर्षों में चलकर वे देश के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में सशक्त रूप में भागीदारी कर सके। प्रारम्भ में ये संवैधानिक सुरक्षाएं एक दशक की अवधि अर्थात ई. 1960 तक थी। बाद में चलकर जब लोकसभा को यह विश्वास हो गया कि आदिवासियों का वह विकास नहीं हुआ है, जो अपेक्षित था तो सुरक्षाओं की अवधि को निरंतर बढ़ाया जा रहा है।
आदिवासियों को प्रकृति पुत्र माना जाता है। वन्य तथा पर्वतीय अंचल उनके पारम्परिक आवास है, जिनमें वे उन्मुक्त आचरण करते हैं। आदिवासी विश्व के लगभग सभी भागों में पाये जाते है। भारत में जनजातियों की आबादी अफ्रीका के बाद सर्वाधिक है। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत भाग अनुसूचित जनजातियों का है। राजस्थान में यह आंकड़ा 13.5 प्रतिशत है। राजस्थान में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, प्रतापगढ़ तथा सिरोही जिलों में राज्य की 45 प्रतिशत जनजातीय जनसंख्या निवास करती है। सदियों तक आदिवासी अनपढ़ रहे है। गरीबी, पिछड़ेपन और शोषण' ने उन्हें इस तरह पददलित कर दिया कि वे सभ्यता की दौड़ में बहुत पीछे रह गये। स्वतंत्र भारत में इस समूह को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए भारतीय संविधान ने आदिवासियों को संवैधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत कुछ विशेष संरक्षी एवं विकास सुविधायें प्रदान की है।
संवैधानिक प्रावधान- अनुसूचित जनजाति सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान - संरक्षी प्रावधानों का उद्देश्य जनजातियों के हितों की सुरक्षा करना है। सुरक्षा संबंधी प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 15(4) 16(4) 19(5) 23, 29, 46, 164, 330, 332, 334, 335, 338, 339(1), 371 (क) 371 (ख) 371 (ग) पांचवी अनुसूची व छठी सूची में निहित है।
अनुच्छेद 15 (4): आर्थिक व शैक्षणिक हितों का विकास अनुच्छेद 15 धर्म, वंश, जाति लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद का निषेध करता है।
अनुच्छेद 15 (4) यह राज्य को सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछडे वर्ग के नागरिकों को अथवा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार प्रदान करता है। इस खण्ड का उद्देश्य अनुच्छेदः 15 व 29 को अनुच्छेद 16(4), 46 व 340 के समरूप लाना है तथा पिछड़े वर्गा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों से संबंधित नागरिकों के लिए शासकीय शैक्षणिक संस्थाओं में राज्य द्वारा स्थान के आरक्षण तथा इनकी प्रगति के लिए आवश्यक प्रावधानों को संवैधानिकता प्रदान करना है।
अनुच्छेद 15 (4) (सरकारी पदों व सेवाओं में आरक्षण) - केवल उन पिछड़े वर्गों एवं अनुसूचित जातियो एवं जनजातियो के नागरिकों के लिए आरक्षण प्रदान करता है, जिसका सरकार के विचार से राजकीय सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नही है।
अनुच्छेद 19 (5) - सम्पति में आदिवासियों के हितों की सुरक्षा अनुच्छेद 19(5) के अन्तर्गत अनुसूचित जनजातियों के नागरिकों के हितों की सुरक्षा हेतु विशेष प्रतिबंध लागू कर सकती है। अनुसूचित जनजातियों के व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से विपन्न तथा स्वभाव से भोले-भाले एवं निष्कपट होते है, उन्हें चालाक व कपटी व्यक्त्ति आसानी से धोखा दे देते है। अत ऐसे कई प्रावधान है जिनमें विशेष परिस्थितियों को छोड़कर उनकी स्वयं की सम्पतियों को भी वे दूसरों को हस्तान्तरित नहीं कर सकते है। स्वयं निजी लाभ के लिए आदिवासी क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से घुमने या बसने अथवा संपत्ति अर्जित करने के लिए कानून बनाए जा सकते हैं।
अनुच्छेद 23 जबरन श्रम का निषेध अनुच्छेद 23 मानव शरीर की सौदेबाजी, बेगार,बधक मजदूर तथा अन्य प्रकार के जबरन श्रस का निषेध करता है। आदिवासियों के संदर्भ में यह अनुच्छेद अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकांश आदिवासी बंधक मजदूर के रूप में काम करते है।
अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक व शैक्षणिक अधिकार अनुच्छेद 29 सांस्कृतिक अथवा भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा संस्कृति को सुरक्षित बनाये रखने का अधिकार प्रदान करता है। यह अनुच्छेद अनुसूचित जनजाति समुदायों को अपनी भाषाओं, बोलियों तथा सस्कृतियों को बनाये रखने का अधिकार प्रदान करता है। सरकार कोई अन्य संस्कृति अथवा भाषा कानून द्वारा उन पर नहीं थोप सकती है।
अनुच्छेद 46: संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार राज्य पिछड़े वगों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ायेगा और विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचायेगा। इस अनुच्छेद के अन्तर्गत नीति-निर्देशक तत्वों को सुचारू रूप से लागू करने के लिए संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में प्रावधान किया गया है।
अनुच्छेद 164: संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार यह प्रावधान किया गया है कि जहा आदिवासियों की जनसंख्या सर्वाधिक है, वहां आदिवासियों के कल्याण के लिए आदिवासी कल्याण मंत्री भी होना चाहिए, यह मंत्री आदिवासियों के हितों को बढ़ावा देगा तथा आदिवासियों का राजनीतिक, शैक्षणिक व आर्थिक विकास करेगा।
अनुच्छेद 320 (4): अनुच्छेद 320 (4) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि 16 के खण्ड़ 4 में संदर्मित किसी प्रावधान के संबंध में अथवा अनुच्छेद 335 के प्रावधानों को प्रभावी रूप दिये जाने के संबंध में लोक सेवा आयोग से सलाह मशविरा करने की आवश्यकता नहीं है।
अनुच्छेद 332: अनुच्छेद 332 के अनुसार प्रत्येक राज्य की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण किया जावेगा।
अनुच्छेद 334: अनुच्छेद 334 के अनुसार संविधान के लागू होने के 10 वर्ष की अवधि तक आरक्षण लागू रहेगा। लेकिन सविधान में संशोधन कर इसे अनवरत बार-बार बढ़ाया जाता रहा है जो आज भी विद्यमान है।
अनुच्छेद 334: इस अनुच्छेद के अन्तर्गत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरी के लिए आरक्षण का प्रावधान है। यह प्रावधान समस्त केन्द्रीय व राज्य सरकार की सेवाओं, अर्द्ध सरकारी संस्थाओं एवं प्रतिष्ठानों पर लागू होता है। इस धारा के अन्तर्गत केन्द्र सरकार की सेवाओं में अनुसूचित जाति हेतु 15 प्रतिशत एवं अनुसूचित जनजाति हेतु 7.5 प्रतिशत पदों पर आरक्षण किया है।
अनुच्छेद 16 (4) के अन्तर्गत राज्यों में भी आरक्षण रखने हेतु मध्य किया गया है।
अनुच्छेद 338 : विशेष अधिकारी - अनुच्छेद 338 के अनुसार अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रपति के द्वारा एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करने का प्रावधान है।
अनुच्छेद 339 (1) आयोग की नियुक्ति - अनुच्छेद 339 (1) के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी समय तथा संविधान के आरंभ होने से 10 वर्षों की अवधि की समाप्ति पर राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर रिपोर्ट लेने हेतु एक आयोग की नियुक्ति का आदेश दे सकते है।
अनुच्छेद 275 (1) अनुसूचित जनजाति विकास सम्बन्धी प्रावधान - अनुच्छेद 275 (1) के अनुसार भारत सरकार के अनुमोदन से कोई भी राज्य सरकार द्वारा अपने क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने अथवा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन स्तर को राज्य के अन्य क्षेत्रों के सामान्य प्रशासन सार तक उपर उठाने के उद्दश्य से चलाई जाने वाली विकास योजनायों के खर्च की पूर्ति के लिए अनुदान के प्रावधान का उल्लेख करता है।
अनुछेद 339 (2) इस अनुच्छेद के अन्तर्गत केन्द्रीय कार्यपालिका राज्यों को अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी निर्देश जारी कर सकती है।
संसद एवं राज्य विधान मण्डलों में आरक्षण - अनुच्छेद 330, 332 तथा 334 अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को उनके अपने राज्यों एवं सघ साक्षित क्षेत्रों से उनकी जनसख्या के प्रतिशत के अनुपात में संसद तथा राज्य विधान मंडलों में सीटों का आरक्षण प्रदान करता है। संविधान में राज्य सभा एवं राज्य विधान परिषदों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। लोकसभा की कुल 543 सीटों में अनुसूचित जनजातियों की 46 आरक्षित सीट है। अनुसूचित जनजातियों के लिए विभिन्न राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों में आरक्षित सीटों की कुल संख्या 59 है।
अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन - संविधान के खंड ग के तहत अनुच्छेद 244 तथा 244 (क) में अनुसूचित क्षेत्रों तथा जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान है। अनुसूचित क्षेत्र संविधान की पांचवी अनुसूची में निहित प्रावधानों के द्वारा नियंत्रित है। जनजातीय क्षेत्र छठी अनुसूची के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित है।
निष्कर्ष - राजस्थान का आदिवासी उप-योजना क्षेत्र विकास की दृष्टि से बहुत पिछड़ा हुआ है। इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों की जोत का आकार बहुत छोटा है। आदिवासी उप-योजना क्षेत्र में तकनीकी विकास बहुत थोड़ा हुआ है। कृषि यंत्रीकरण भी बहुत न्यून है। पशु-धन भी सुधरी नस्ल का नहीं है। इस प्रकार जनजातियों की सुरक्षा एवं विकास के लिए संविधान में व्यापक व सुनियोजित प्रावधान किये गये है। परन्तु जनजातियों की सुरक्षा एवं विकास हेतु उठाये जाने वाले कदम ज्यादा प्रभावी नहीं रहे है। आदिवासी परम्पराएं एवं अशिक्षा, रूढ़ियों ने इस समूह को पिछड़ा रखा है। अतः आवश्यकता इनके आर्थिक सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने तथा जीवन पद्धति में गुणवत्ता लाने की है जिससे इनका जीवन स्तर गैर आदिवासियों के बराबर आ जाये।
संविधान ने आदिवासियों और इसी तरह कमजोर वर्गों के लिए विशेष सुरक्षाएं प्रदान की है। इन सुरक्षाओं का बहुत बड़ा उद्देश्य यह है कि ये कमजोर वर्ग जल्दी से जल्दी विकसित हो जाए। आज कमजोर वर्गों और उन्नत वर्गों में जो खाई है वह शीघ्र पट जानी चाहिये। यह तभी होगा जब इन वर्गों की जीवन पद्धति में सुधार आ जाये। जब यह सब उपलब्धियाँ हो जायेंगी तो आदिवासी तथा अन्य पिछड़े हुए वर्ग देश के विशाल राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में प्रभाव पूर्ण भागीदारी कर सकेंगे और देश 2047 तक विकसित भारत के रूप को प्राप्त कर दुनिया में अपना परचम लहरायेगा ।
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