भारत की आदिम जनजातियां: सामाजिक - सांस्कृतिक संरचना एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां

 सार (Abstract)
    भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ आदिम जनजातियाँ आज भी अपनी प्राचीन जीवन-शैली, सांस्कृतिक परंपराओं एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के साथ अस्तित्व में हैं। भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया है, जिनमें से कुछ जनजातियाँ अत्यंत संवेदनशील अवस्था में हैं, जिन्हें वर्तमान में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) कहा जाता है। यह शोध-पत्र भारत की आदिम जनजातियों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, आर्थिक जीवन, धार्मिक विश्वासों, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों तथा समकालीन चुनौतियों का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है। साथ ही, सरकारी नीतियों एवं संरक्षण प्रयासों की प्रभावशीलता का विश्लेषण भी किया गया है।

Key Words: Primitive Tribes of India, PVTGs, Indigenous Knowledge Systems, Tribal Culture, Conservation

प्रस्तावना (Introduction)- भारत की जनजातीय संस्कृति मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरणों की जीवंत अभिव्यक्ति है। आदिम जनजातियाँ वे समुदाय हैं जिन्होंने ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सामाजिक कारणों से आधुनिक विकास की मुख्यधारा से दूरी बनाए रखी। इन जनजातियों का जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित रहा है और इनका सामाजिक संगठन अत्यंत सरल, सामुदायिक एवं आत्मनिर्भर रहा है।
औपनिवेशिक काल में इन समुदायों को “Primitive” शब्द से संबोधित किया गया। भारत सरकार ने इन्हें PVTGs के रूप में वर्गीकृत कर विशेष विकास योजनाएँ लागू की हैं।

आदिम जनजातियों की अवधारणा (Concept of Primitive Tribes)- 
आदिम जनजातियों की पहचान निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर की जाती है:
1.अत्यंत कम जनसंख्या वृद्धि
2.निम्न साक्षरता दर
3.शिकार-संग्रह या पारंपरिक कृषि पर निर्भरता
4.तकनीकी पिछड़ापन
5.बाहरी समाज से सीमित संपर्क
    भारत में वर्तमान में 75 PVTGs को मान्यता प्राप्त है, जो विभिन्न राज्यों में फैली हुई हैं।

भारत की प्रमुख देम जनजातियाँ (Major Primitive Tribes of India)-
A. सहरिया जनजाति (Sahariya Tribe)- 
   सहरिया जनजाति राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में पाई जाती है। इनका जीवन वनोपज, कृषि मजदूरी एवं पारंपरिक ज्ञान पर आधारित है। सामाजिक संरचना कबीलाई है तथा प्रकृति-पूजा इनकी धार्मिक आस्था का केंद्र है।
B. बैगा जनजाति (Baiga Tribe)- 
   बैगा जनजाति मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में निवास करती है। यह जनजाति "धरती माता" की पूजा करती है और पारंपरिक बेवर खेती प्रणाली अपनाती है। औषधीय पौधों का इनका ज्ञान अत्यंत समृद्ध है।
C.बिरहोर जनजाति (Birhor Tribe)- 
  झारखंड की बिरहोर जनजाति अर्ध-घुमंतू जीवन शैली अपनाती है। बाँस एवं रस्सी निर्माण इनकी पारंपरिक आजीविका है। जनसंख्या अत्यंत सीमित होने के कारण यह जनजाति विलुप्ति के कगार पर है।
D. टोडा जनजाति (Toda Tribe)- 
   तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में रहने वाली टोडा जनजाति भैंस पालन पर आधारित अर्थव्यवस्था रखती है। इनकी कढ़ाई कला को UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त है।
E.जारवा जनजाति (Jarwa Tribe)- 
  अंडमान द्वीप समूह की जारवा जनजाति आज भी बाहरी दुनिया से लगभग पूर्णतः अलग-थलग जीवन जीती है। भारतीय कानून द्वारा इनके संपर्क को प्रतिबंधित किया गया है।
सामाजिक संरचना (Social Structure)- 
  आदिम जनजातियों की सामाजिक संरचना सामूहिकता पर आधारित होती है। परिवार संयुक्त होते हैं, निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं और सामाजिक नियंत्रण परंपरागत परिषदों द्वारा संचालित होता है। विवाह, जन्म और मृत्यु से जुड़े संस्कार अत्यंत सरल होते हैं।

आर्थिक जीवन (Economic Life)- 
आदिम जनजातियों की अर्थव्यवस्था मुख्यत- 
A.शिकार एवं संग्रह
B.पारंपरिक कृषि
C.वनोपज संग्रह
D.हस्तशिल्प
   पर आधारित रही है। आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था से इनका संपर्क सीमित रहा है।

धार्मिक विश्वास एवं सांस्कृतिक जीवन (Religion and Culture)- 
    इन जनजातियों की धार्मिक मान्यताएँ प्रकृति-पूजक होती हैं। पर्वत, वृक्ष, नदियाँ और पशु देवता होते हैं। लोकनृत्य, लोकगीत एवं मौखिक परंपराएँ संस्कृति के प्रमुख वाहक हैं।

स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ (Indigenous Knowledge Systems)- 
   आदिम जनजातियाँ औषधीय पौधों, मौसम पूर्वानुमान, बीज संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में अत्यंत दक्ष रही हैं। आधुनिक विज्ञान आज इन प्रणालियों को पुनः मान्यता दे रहा है।
समकालीन चुनौतियाँ (Contemporary Challenges)- 
1.वनों का क्षरण
2.स्वास्थ्य एवं कुपोषण
3.शिक्षा की कमी
4.सांस्कृतिक विघटन
5.विस्थापन एवं शहरीकरण

संरक्षण एवं सरकारी प्रयास (Conservation and Government Initiatives)- 
   भारत सरकार द्वारा PVTG Development Scheme, वन अधिकार अधिनियम, शिक्षा एवं स्वास्थ्य योजनाएँ चलाई जा रही हैं। हालांकि, क्रियान्वयन में 
कई बाधाएँ विद्यमान हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)- भारत की आदिम जनजातियाँ मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण हेतु केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवेदनशीलता एवं सहभागी विकास दृष्टिकोण आवश्यक है।

संदर्भ सूची (References)- 
1.Verrier Elwin – The Tribal World of               Verrier Elwin
2.Xaxa, Virginius – Tribes and Indian               Society
3.Ministry of Tribal Affairs, Government of     India
4.ICSSR Research Journals


           Dr. kantilal Ninama 
             Lecturer - History 
        Govt. College, Ghatol
            Banswara, Rajasthan 

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Nice article

wwwtribalcultureheritage.com

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