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जनजाति क्षेत्र वागड़ में शिक्षा एवं शासकीय प्रयास

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      दक्षिणी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में भील, मीणा, गरासिया और डामोर जनजातियां निवास करती है। भील बहुसंख्यक बांसवाड़ा-डूंगरपुर जिला जनजाति उपयोजना क्षेत्र (Tribal Sub-Plan Area) घोषित है। लगभग 30 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23°1 से 24°24 पूर्वी देशांतरों के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर, पूर्व में मध्यप्रदेश तथा दक्षिण पश्चिम में गुजरात राज्य की सीमाएं लगी हुई है। इसका क्षेत्रफल करीब 4000 वर्ग मील तथा राजस्थान की कुल जनजातियों की 25.46 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।      इस प्रदेश का वागड़ नाम करीब एक सहस्त्राब्दी से प्रचलित पाया जाता है। पुराने शिलालेखों, ताम्रपत्रों, जीवन चरितो तथा अन्य प्रणालियों आदि में इसका उल्लेख प्राप्य है। संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं के विद्वानों ने इस वागड़, वागड, व्यागड़ एवं वाग्वार  आदि शब्दों से सम्बोधित किया है। प्राचीन वागड़ क्षेत्र में वर्तमान डूंगरपुर और बांसवाड़ा के राज्यों तथा मेवाड़ राज्य का कुछ दक्षिणी भाग अर्थात् छप्पन नामक प्रदेश का समावेश होता था।      शिक्ष...

आदिवासी विकास हेतु भारतीय संविधान में उल्लेखित प्रमुख प्रावधान

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      भारत विभिन्न समुदायों का एक सांस्कृतिक संगम है। जिसमें सभी पंथों, धर्मों, वर्गों एवं जातियों के विकास हेतु भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान निहित है।आदिवासियों की विशेष आवश्यकताओं को समझते हुए भारत के संविधान में इन समुदायों के हर संभव शोषण से बचाव के लिए कतिपय विशेष रक्षोपाय किए गये है और इस प्रकार सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया गया है। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत सभी को समान अधिकार और अवसर प्रदान किये गये है। अनुच्छेद 15 लिंग, धर्म, जाति, वर्ण आदि के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 15(4) किसी भी सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिक के पक्ष में जिसका राज्य की राय में राज्य के अन्तर्गत सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं है ,नियुक्तियों अथवा पदों में आरक्षण हेतु व्यवस्थाएं करे। अनुच्छेद 46 राज्य को आदेश देता है कि वह कमजोर वर्गों खासतौर पर आदिवासियों के शैक्षिक तथा आर्थिक हितों की विशेष देखभाल तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन देता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार र...

भील जनजाति में दीपावली का त्यौहार एवं सामाजिक महत्व

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     त्यौहार एवं उत्सव मानव-समाज के उल्लास के प्रतीक हैं। इनके माध्यम से विह्वल मांनव अपनी दुःख मय जीवन-कथा को सुखी बनाता है और कुछ समय के लिए स्वर्गीय वातावरण में अपने आपको निमग्न कर लेता है।        भील जनजाति के उत्सव उनकी आस्थाओं, विश्वासों एवं परम्पराओं के परिचायक हैं। इनसे हम इनके देवी-देवताओं से अवगत होते हैं और इनकी सामाजिक भावानाओं को सहज ही समझ लेते हैं। अन्य आदिवासियों की तरह भील भी आस्तिक हैं और श्रद्धावान होने के कारण वे अपने प्रत्येक उत्सव (धार्मिक अथवा सामाजिक) को देवी-देवता की आराधना से प्रारम्भ करते हैं। नवीन अन्न की प्राप्ति पर वे आनन्द से झूम उठते हैं और इसे सर्वप्रथम अपने देवता के चरणों में रखकर अपनी कृतज्ञता का प्रकाशन करते हैं। परिचय - भारत त्यौहारों का देश है जहाँ प्रत्येक समुदाय अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार पर्व मनाता है। इन्हीं विविधताओं के बीच राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी राजस्थान की वागड़ भूमि में निवास करने वाली भील जनजाति अपनी विशिष्ट लोकसंस्कृति और उत्सवों के लिए जानी ...

दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी समाज में विवाह की अनूठी परम्परा -"नोतरा प्रथा" गांव वाले एवं रिश्तेदार करते है मदद

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    दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी समाज सामुदायिक भावना, सामूहिक जीवन और सामूहिक उत्सव एवं परम्पराओं को मनाने के लिए राजस्थान ही नहीं पुरे देश में प्रसिद्ध है। भील समुदाय की सामुदायिक भावना सामेला प्रथा,नोतरा प्रथा विश्वप्रसिद्ध है। दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी समुदाय सुख-दुःख, शादी-ब्याह, मौत-मरण, और पारस्परिक सहयोग और सामाजिक एकता के लिए प्रसिद्ध है। जनजातीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और पुरे समुदाय का उत्सव होता है। इस विवाह प्रकिया में " आर्थिक सहयोग की परम्परा" एक अनूठी सामाजिक प्रथा है जो गरीब आदिवासी परिवार अपने बच्चों की शादी नोतरा प्रथा से ही  करा पाते है। शादी का खर्च उठा पाते हैं।       दक्षिणी राजस्थान की अनूठी परम्परा है नोतरा प्रथा   यह आदिवासी अंचलों में परस्पर सहयोग की एक ऐसी परम्परा जीवित है जो पूरी तरह विश्वास और सामूहिक भागीदारी पर टिकी है। नोतरा प्रथा से सिर्फ शादी ही नहीं बल्कि अन्य आवश्यकताओं को भी सामुदायिक सहयोग से पूरा किया जाता है नोतरा प्रथा -  नोतरा प्रथा एक सामुदायिक...

आदिवासी लोक संस्कृति में भील जनजाति के लोकगीतों एवं लोकनृत्यों का ऐतिहासिक महत्व

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      भारत एक विविधता से भरा हुआ देश है जहाँ विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवनशैलियाँ देखने को मिलती हैं। इन्हीं विविधताओं के बीच आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपराओं के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदिवासी संस्कृति की आत्मा उनके लोकगीतों और लोकनृत्यों में बसती है। ये दोनों न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि उनके जीवन दर्शन, सामाजिक एकता, धार्मिक विश्वास और भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी हैं। आदिवासी लोक संस्कृति में लोकगीतों और लोकनृत्यों का गहरा महत्व है, क्योंकि इनके माध्यम से ही उनकी संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहती आई है।      आदिवासी लोक संस्कृति मौखिक परंपराओं, गीतों, नृत्यों, कहानियों और अनुष्ठानों पर आधारित होती है। यह संस्कृति लिखित ग्रंथों पर नहीं, बल्कि स्मृति और अभिव्यक्ति पर निर्भर करती है। आदिवासी समाज प्रकृति के अत्यंत निकट रहता है और उसका संपूर्ण जीवन पर्यावरण से जुड़ा होता है। जंगल, नदी, पर्वत, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि सभी उनके जीवन और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। इसी संबंध को वे अपने लोकगीतों और ल...

गोविन्द गिरी का भगत आंदोलन और मानगढ़ हत्याकांड

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      स्वतंत्रता के लिए सतत् संघर्ष और शौर्य परम्परा में राजस्थान का भारत ही नहीं, विश्व के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रहा है। राजस्थान के स्वतंत्रता आन्दोलन, सामाजिक और धार्मिक पुनरोत्थान और स्वदेशी आन्दोलन का राजस्थान के जन-जीवन पर काफी असर पड़ा है। श्यामजी कृष्ण वर्मा, केसरीसिंह बारहठ, गोपालसिंह, अर्जुनलाल सेठी, विजयसिंह पथिक और मोतीलाल तेजावत राजस्थान में जनजागृति के अगुवा रहे हैं, किन्तु स्वतंत्रता और सामाजिक, धार्मिक सुधार की पहली मशाल गुरू गोविन्दगिरी ने जलाई और राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम में भीलों को भागीदारी दिलाने का श्रेय भी पूर्णतया गुरू गोविन्द गिरी को जाता है। उन्होंने समाज सुधार का प्रचण्ड आन्दोलन छेड़कर लाखों भीलों को भगत बनाकर सामाजिक जनजागृति एवं भक्ति आन्दोलन के जरिये आजादी की अलख जगाई।   जीवन परिचय -   वागड़ में ब्रिटिश शासन एवं सामन्तवादी सत्ता के खिलाफ गुरू गोविन्द गिरी ने आवाज उठाई तथा जनजाति भील समाज की रूढ़िवादी मान्यताओं के खिलाफ उन्होंने बगावत के झण्डे गाड़ दिये और अपने त्याग, तपस्या और कर्मठता से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास...

अनूठी है दक्षिणी राजस्थान में आदिवासी बच्चों की नामकरण परम्परा

    दक्षिणी राजस्थान में मुख्य रूप से बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिले आते है जो वागड़ के नाम से प्रसिद्ध है। वागड़ क्षेत्र में भील, मीणा, गरासियाऔर डामोर जनजातियां निवास करती है। प्राचीन वागड़ क्षेत्र में वर्तमान डूंगरपुर और बांसवाड़ा के राज्यों तथा मेवाड़ राज्य का कुछ दक्षिणी भाग अर्थात छप्पन नामक प्रदेश का समावेश होता था। अध्ययन क्षेत्र का परिचय -      दक्षिणी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में भील, मीणा, गरासिया और डामोर जनजातियां निवास करती है। लगभग 80 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23° 1' से 74° 24' पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित है। आदिवासी क्षेत्र वागड़ अंचल राजस्थान का सर्वाधिक पिछड़ा, अविकसित मूलभूत बुनियादी नागरिक सुविधाओं से वंचित क्षेत्र है। सदियों से अशिक्षा और अंधकार के क्षेत्र में जी रहे आदिवासी लोगों के जीवन में शिक्षा और ज्ञान की रोशनी लाने की त्वरितः आवश्यकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और कृषि विकास की योजनाओं तक लोगों की पहुंच नहीं बन पाई है। जंगलों और वर्षा पर आधारित कृषि पर निर्भर आर्थिक रूप से बेहद कमजोर यहां की आबादी रोजग...