भारत में जनजातीय विकास नीतियों का विश्लेषण:उपलब्धियां और चुनौतियां
भारत की जनजातीय आबादी (अनुसूचित जनजातियाँ) देश की सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक ज्ञान की महत्वपूर्ण धरोहर है। आजादी के बाद से सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, भूमि-अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से जनजातीय समुदायों के समग्र विकास के लिए कई नीतियाँ और कार्यक्रम लागू किए हैं। इस लेख में प्रमुख नीतियों की उपलब्धियों और चुनौतियों का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत है। विश्व के सभी समाजों में विकास के कार्य उन्हीं लोगों के लिये किए जाते हैं जो विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक पिछड़े होकर जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होते हैं अथवा अभावग्रस्त होकर, जीवनयापन करने को मजबूर रहते हैं। भारतीय समाज में भी एक ऐसा समुदाय है जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक दृष्टि से आज भी अत्यधिक पिछड़ा है जिन्हें आदिम जाति, आदिवासी, वन्यजाति, गिरीजन, जनजाति, अनुसूचित जनजाति आदि नामों से सम्बोधित किया जाता रहा है। वैरियर एल्विन इन्हें आदिम जाति से सम्बोधित करते हैं वहीं डॉ. घुरिये इन्हें पिछड़े हिन्दू मानते हैं।" ...