भील जनजाति के लोकगीत: परंपरा, प्रकार और महत्व
भील जनजाति भारत की प्राचीनतम आदिवासी जनजातियों में से एक है, जिसका निवास मुख्यतः राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासी अंचलों में पाया जाता है। भीलों की सांस्कृतिक पहचान में लोकगीतों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। ये लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि इतिहास, सामाजिक संरचना, धार्मिक आस्था, प्रकृति-बोध और सामुदायिक स्मृति के वाहक हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा से चले आ रहे ये गीत आज भी भील समाज के दैनिक जीवन, उत्सवों और संस्कारों में जीवंत हैं।
भील लोकगीतों की परंपरा- भील लोकगीतों की परंपरा मौखिक (Oral Tradition) है। इन्हें किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि अनुभव, स्मृति और सामूहिक गायन के माध्यम से संरक्षित किया गया है। ढोल, मांदल, थाली, बाँसुरी जैसे वाद्यों के साथ सामूहिक गायन इनकी पहचान है। गीतों की भाषा क्षेत्रानुसार भीली, वागड़ी, मालवी, निमाड़ी आदि बोलियों में मिलती है।
भील समाज में लोकगीत जन्म से मृत्यु तक हर अवसर पर गाए जाते हैं—जैसे जन्मोत्सव, विवाह, फसल कटाई, देवी-देवताओं की पूजा और सामुदायिक मेलों में। ये गीत सामुदायिक एकता को सुदृढ़ करते हैं और सामाजिक मूल्यों का संचार करते हैं।
भील लोकगीतों के प्रमुख प्रकार-
1.धार्मिक एवं देवी-देवता आधारित लोकगीत- इन गीतों में बड़ादेव (महादेव), काली, माता जी, भैरव आदि की स्तुति मिलती है। वर्षा, अच्छी फसल और ग्राम-कल्याण की कामना के साथ ये गीत सामूहिक रूप से गाए जाते हैं।
2.जीवन-संस्कार से जुड़े लोकगीत- जन्म, नामकरण, विवाह और मृत्यु जैसे संस्कारों में गाए जाने वाले गीत जीवन-चक्र को अभिव्यक्त करते हैं। विवाह गीतों में प्रेम, हास्य और सामाजिक संबंधों का चित्रण मिलता है।
3.ऋतु एवं कृषि आधारित लोकगीत-
मानसून के आगमन, बुवाई-कटाई और फसल उत्सवों पर गाए जाने वाले गीत प्रकृति-पूजा और श्रम-संस्कृति को दर्शाते हैं। ये गीत पर्यावरण के प्रति सम्मान की भावना को पुष्ट करते हैं।
4.वीरगाथात्मक एवं ऐतिहासिक लोकगीत-
भील इतिहास के वीर नायकों - एकलव्य, गोविंद गुरु-की वीरता, बलिदान और संघर्षों का वर्णन इन गीतों में मिलता है। ये गीत सामुदायिक गर्व का स्रोत हैं।
5.प्रेम एवं लोककथात्मक गीत-
प्रेम, विरह, सामाजिक बाधाओं और लोककथाओं पर आधारित गीत भील लोकजीवन की भावनात्मक गहराई को प्रकट करते हैं।
प्रमुख लोकगीत -
रूपया लाजू वे तो लाव, ने तो रेजे झांपा बार
टीलड़ी लाजू वे तो लाद
पडलु लाजु वे तो लाव
दारू लाजू वे तो लाव, घुघरी लाजू वे तो लाव
रूपया लाजू वे तो लाव, मोडिला लाजू वे तो लाद
पागड़ी लाजू वे तो लाद
डाला कटारी लाजू वे तो लाद ने तो रेजे झांपा बार
वधू पक्ष की भील मीणा-सुंदरिया वर को सम्बोधित करके यह गीत गाती है. वर से वे कहती है- यदि तू रूपए लाया है तो अन्दर आना वरना बाहर ही रहना। वधू के माथे पर लगाने के लिए बिन्दिया लाया है तो आना नही तो भीतर मत आना, इसी तरह वधू के लिए वस्त्र घुघरी, पगड़ी, कटारी आदि वस्तुओं की मांग की जाती है।
गोविन्द गुरू द्वारा रचा गीत -
झालोद माय मारी कुंडी है.
दाहोद माय मारो दीयो है,
भूरेटिया नी मानु रे...
गोधरा मांय मारी जाजम है.
अहमदाबाद माय बैठक है.
दिल्ली माय मारी गादी है,
बेणेश्वर माय मारो चोपडों है,
मानगढ़ मारी धूणी है। मूरेटिया.
जंबू में मारो अखाड़ों है,
वेरा ने वाली ने पंचायत राज करबू है। भूरेटिया..........
गोविन्द गुरु वागड़ प्रदेश को ही जम्बूखण्ड मानते थे। भूरेटिया अर्थात फिरंगियों (अंग्रेजों) को वे अपना असली दुश्मन मानते थे। चूंकि उन्हीं के कारण देशी राजाओं ने आदिवासी विरोधी नीतियां लागू की थी। जागृति आन्दोलन का प्रमुख केन्द्र मानगढ़ बन गया था। अंग्रेजों का सत्ता केन्द्र दिल्ली था। इसी गीत से संकेत मिलते है कि गोविन्द गुरु का अन्तिम लक्ष्य दिल्ली की राजगद्दी था अर्थात् अंग्रेजी राज का खात्मा। उनकी विचारधारा का केन्द्रीय भाव आदिवासियों को कष्टों से मुक्ति दिलाना था।
भील लोकगीतों का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व-
1.इतिहास का मौखिक अभिलेखः लोकगीतों में भील समाज का इतिहास, संघर्ष और उपलब्धियाँ सुरक्षित हैं।
2.सामाजिक शिक्षाः नैतिक मूल्यों, सामुदायिक नियमों और परंपराओं का संचार होता है।
3.सांस्कृतिक पहचान: लोकगीत भील समाज की विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हैं।
4.प्रकृति-संरक्षण का संदेश: जंगल, नदी, पर्वत और पशुओं के प्रति सम्मान का भाव मिलता है।
5.सामुदायिक एकताः सामूहिक गायन सामाजिक बंधन को मजबूत करता है।
समकालीन चुनौतियाँ और संरक्षण की आवश्यकता
आधुनिकीकरण, शहरीकरण और नई मनोरंजन विधाओं के कारण भील लोकगीतों की परंपरा संकट में है। युवा पीढ़ी का इससे दूर होना एक बड़ी चुनौती है। अतः आवश्यक है कि —
*लोकगीतों का दस्तावेजीकरण किया जाए,
*विद्यालयी पाठ्यक्रमों में आदिवासी लोकसंस्कृति को स्थान मिले,
*डिजिटल प्लेटफॉर्म और शोध परियोजनाओं के माध्यम से इनका प्रसार हो।
निष्कर्ष- भील जनजाति के लोकगीत केवल संगीत नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन हैं। ये गीत भील समाज की सामूहिक स्मृति, प्रकृति-संबंध और सामाजिक मूल्यों को जीवित रखते हैं। इनका संरक्षण न केवल आदिवासी संस्कृति के लिए, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विविधता के लिए भी अनिवार्य है।
फुटनोट / संदर्भ ग्रन्थ सूची-
1.वर्मा, रामनिवास. आदिवासी लोकसंस्कृति. नई दिल्लीः राजकमल प्रकाशन.
2.शर्मा, बद्रीलाल. “भील जनजाति की सांस्कृतिक परंपराएँ." भारतीय लोक अध्ययन पत्रिका, अंक 12.
3.Government of India. Tribal Culture of India. Ministry of Tribal Affairs.
4.एल्विन, वेरियर. The Tribal World of Verrier Elwin. Oxford University Press.
5.सिंह, के.एस. People of India: Rajasthan. Anthropological Survey of India.
6.हरिराम मीणा (2013) "आदिवासी दुनिया" राष्ट्रीय पुस्तकं न्यास. नई दिल्ली।
7.संतोष कुमारी जैन (2001) "आदिवासी भील मीणा युनिक ट्रेडर्स जयपुर।
8.श्रीचन्द जैन (2015) "वनवासी भील और उनकी संस्कृति" राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर।
9.हरिराम मीणा (2013) "मानगढ धाम" अलख प्रकाशन जयपुर।
Author: Dr. Kantilal Ninama
Research interest: Tribal studies, Indigenous Knowledge Systems, tribal culture and Heritage, History
This article is based on academic sources and field understanding.
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