जनजाति क्षेत्र बांसवाड़ा जिले में प्रमुख पर्यटन स्थल एवं उनका सांस्कृतिक महत्व

     पर्यटन के प्रति आरंभ से ही मनुष्य की रूचि रही है। इस रूचि के कारण ही लोग पहले लम्बी-लम्बी यात्राएं वर्षों तक किया करते थे। अपने समृद्धशाली व वैविध्यपूर्ण पर्यटन स्थलों के कारण राजस्थान आरंभ से ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। यहां कहीं दूर तक फैला रेत का समन्दर पर्यटकों को मौन आमंत्रण देता है तो कहीं शीतलता का एहसास कराती यहां की झीलें व नदियां स्वतः ही पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। दरअसल जितनी समृद्ध यहां की लोक परम्पराएं व विरासत की वस्तुएं है इतना ही वैभवपूर्ण है यहां के किला व महलों का सौंदर्य। "पधारों म्हारै देश" के आमंत्रण के साथ पर्यटन का विकास तेजी से बढ़ रहा है।

पर्यटन की आधारिक संरचना- 
     राजस्थान में पर्यटन की आधारिक संरचना का अधिकतर कार्य सरकारी क्षेत्र में पर्यटन विभाग द्वारा ही किया हुआ है। ऐसे में पर्यटन प्रबन्ध का समस्त जिम्मा भी राज्य सरकार ही अपने पर ओढ़े हुए है। राज्य में पर्यटन गतिविधियों को प्रोत्साहन तो रियासत काल से ही प्रारम्भ हो गया था परन्तु व्यवस्थित रूप से पर्यटन का विकास वर्ष 1955 में राज्य में पर्यटन-विकास एवं पर्यटन के सुनियोजित प्रबन्ध के लिए पर्यटन निदेशालय की स्थापना से हुआ। इसके बाद सन् 1978 में राजस्थान पर्यटन विकास निगम की भी पृथक से स्थापना की गयी। पर्यटन केन्द्रों पर आवास, यातायात, भोजन एवं मनोरंजन की सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा 24 नवम्बर 1978 को राजस्थान पर्यटन विकास निगम की स्थापना की गई। राज्य सरकार द्वारा मार्च 1989 में एक आदेश के माध्यम से पर्यटन को उद्योग का दर्जा देने की घोषणा की गई तथा केन्द्र सरकार की भांति वर्ष 1991 और वर्ष 1992 को पर्यटन वर्ष के रूप में मनाया गया। वर्ष 2001 में पर्यटन उद्योग के सर्वांगीण विकास के लिए नई पर्यटन नीति बनाई गई।

अध्ययन परिचय- 
    राजस्थान के दक्षिणी छोर में गुजरात और मध्यप्रदेश की सरहदों को छूता और इनकी लोक संस्कृति से प्रभावित बांसवाड़ा जिला ऋषि-मुनियों, सिद्ध सन्तों योगियों, भक्त कवियों, नैसर्गिक सौन्दर्य आदिम संस्कृति को समेटे हुये,उत्सव पर्व और मेला रंगों, मंदिरों तथाआध्यात्मिक चिन्तन से भरा-पूरा इलाका है। नैसर्गिक सौन्दर्य श्री से घिरा राज्य का आदिवासी बाहुल वाग्वर अंचल का बांसवाड़ा जिला अपने पुरातत्व, शिल्प, स्थापत्य, आदिम संस्कृति के साथ ही समृद्ध इतिहास के लिए प्रदेश में ख्यातनाम रहा है।
     चतुष्कोणीय आकृतिवाला बांसवाड़ा जिला राज्य के ठीक दक्षिण में अरावली की उपत्यकाओं से आवेष्ठित है और इसका क्षेत्रफल 5,076.99 वर्ग किलोमीटर है। प्राचीन वागड़ अथवा वाग्वर प्रदेश के नाम से विख्यात यह क्षेत्र जिसमें बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर दोनों जिले समाहित है। बांसवाड़ा उसी क्षेत्र का एक हिस्सा है। जिले की आकृति चतुष्कोणीय हैं इसके पूर्वी-दक्षिणी भाग में मध्यप्रदेश राज्य के रतलाम एवं झाबुआ जिलों की सीमाएं दक्षिण में गुजरात राज्य के दाहोद जिले की सीमाएं पश्चिम में डूंगरपुर जिले तथा उत्तर में राज्य के नव-सृजित प्रतापगढ़ जिले की सीमाएं है। पर्यटन की दृष्टि से अनेकों ऐतिहासिक, धार्मिक एवं आधुनिक स्थल जिले में विद्यमान है। जिसमें अर्थूना, पाराहेडा के प्राचीन मंदिर घोटिया आम्बा, भीम कुण्ड, रामकुण्ड, मानगढ़-धाम, ब्रह्माजी मंदिर छींछ, त्रिपुरा सुन्दरी माताजी मंदिर, मंदारेश्वर, माही बजाज सागर बांध, कागदी पिक-अप वीयर, माही पावर प्लान्ट, महाराणा प्रताप सेतु आदि प्रमुख है। जिला रेल सेवाओं से पूर्णतया वंचित है। वर्ष के दौरान रेल बजट भाषण में बांसवाड़ा से डूंगरपुर रेल लाईन सर्वे की घोषणा होने से रेल से जुड़ने की आस बंधी है साथ ही जिले में परमाणु ताप बिजलीघर व इन्जीनियरिंग कॉलेज की घोषणा से जिले की विकास की गति में अभिवृद्धि होना तय है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- 
     वागड़ राज्य की स्थापना के विभिन्न विवरण पाये जाते है, तथापि वास्तविक संस्थापक सामन्तसिंह ही था। जिसने 1179 ईस्वी के लगभग वागड़ प्रदेश को अधिकृत किया। सामन्तसिंह के पुत्र सिंहड़देव के पौत्र वीरसिंह देव (विक्रम सम्वत् 1343-1349) तथा वागड़ के गुहिलवंशीय राजाओं की राजधानी बड़ौदा (डूंगरपुर) थी। जब वीरसिंह के पोते डूंगरसिंह ने डूंगरपुर शहर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया तब से वागड़ के राज्य का नाम उसकी नई राजधानी के नाम से "डूंगरपुर" प्रसिद्ध हुआ। यहां के उत्तराधिकारी रावल उदयसिंह मेवाड़ के महाराणा सांगा के साथ लड़ाई में मारा गया था। उन्होंने जीते जी ही डूंगरपुर राज्य के दो हिस्से कर पश्चिमी हिस्सा अपने ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को और पूर्वी का अपने पुत्र जगमाल को दे दियाबांस के जंगलों की बहुतायत अथवा मेजर एरस्किन के अनुसार यहां के प्रतापी शासक बांसिया भील को जगमाल द्वारा मार दिये जाने के फलस्वरूप इस क्षेत्र का नाम बांसवाड़ा प्रसिद्ध हुआ।

प्रमुख पर्यटन स्थल- 
     जिले का मुख्यालय बांसवाड़ा है और भूतपूर्व बांसवाड़ा रियासत के प्रथम प्रमुख जगमाल द्वारा अथवा भील सरदार बासिया भील द्वारा बसाया गया बताया जाता है। यह चार शताब्दियों तक रियासत की राजधानी बना रहा है। कस्बे के पूर्व में प्रतिवेशी पहाड़ियों द्वारा बने एक गर्त में बाईतलाब नाम से ज्ञात एक कृत्रिम तालाब है जो महारावल जगमाल की रानी द्वारा निर्मित बताया जाता है। लगभग 1 किमी दूरी पर रियासत के शासकों की छतरियां है। कस्बे में कुछ हिन्दू व जैन मंदिर व एक पुरानी मस्जिद भी है। एक मुसलमान सन्त अब्दुला पीर का मकबरा निकटस्थ ग्राम भवानपुरा में स्थित है। इस स्थान पर प्रतिवर्ष बोहरा मुसलमान बड़ी संख्या में एकत्रित होते है। माही परियोजना बांध की नहरों में पानी वितरण के लिए शहर के पास निर्मित कागदी पिक-अप वियर पर हाल ही विकसित किया गया उद्यान भी सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

पाराहेड़ा-  ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पाराहेड़ा (गढ़ी तहसील) जिला मुख्यालय से 22 किमी की दूरी पर स्थित है। मण्डलिक द्वारा निर्मित मण्डलेश्वर मंदिर नाम से ज्ञात शिव का एक मंदिर ग्राम में नगेला तालाब के तट पर स्थित है। यहा प्राप्त एक शिलालेख वागड के परमार शासकों के बारे में मूल्यवान सूचना प्रदान करता है।

घोटिया आम्बा- महाभारत कालीन युग की याद दिलाने वाला जिले का घोटिया आम्बा स्थल अत्यन्त रमणीय है जो बागीदौरा पंचायत समिति क्षेत्र में आता है। यह स्थल बांसवाड़ा से लगभग 30 किमी दूर है। महाभारत कथा के अनुसार पाण्डवों ने वनवास के समय अपना कुछ समय घोटिया आम्बा केलापानी स्थल पर गुजारा था। यहीं पर पाण्डवों ने भगवान कृष्ण की सहायता से 88 हजार ऋषियों को रस युक्त भोजन कराया था। 
     इन्द्र द्वारा प्रदत्त आम की गुठली को पाण्डवों ने यहां रोपा था उस स्थल पर आज भी आम का पेड़ लगा हुआ है यहां पाण्डवों के पांच कुण्ड बने हुए है तथा घोटेश्वर महादेव के मंदिर में कुन्ती व द्रोपदी सहित पाण्डवों की मूर्तियां भी स्थापित है। घोटेश्वर से लगभग 1 किमी दूर पठार पार करते ही केलापानी का सुरम्य स्थल आ जाता है जहां प्राकृतिक झरने से गौमुख में होता हुआ शिवलिंग पर हर समय पानी गिरता रहता है। यहां स्थित शिव मंदिर में भी पाण्डवों ने 88 हजार ऋषियों को केले के पत्तों पर भोजन कराया था। घोटिया आम्बा स्थल पर प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या से दूज तक भारी मेला पड़ता है जो जिले का सबसे बड़ा ग्रामीण मेला है। 50 हजार से भी अधिक स्त्री-पुरुषजिसमें अधिकांश आदिवासी होते है, इसमें भाग लेते है तथा पाण्डव कुण्डों में स्नान कर घोटेश्वर महादेव एवं आम के पेड के दर्शन करते है।
छींछ का ब्रह्मा मंदिर- 12वीं शताब्दी में छींछ ग्राम में बना ब्रह्माजी का मंदिर राज्य के इने-गिने मंदिरों में से एक है ब्रह्माजी की इतनी बड़ी विशाल मूर्ति वाला मंदिर आसपास और कहीं नहीं है। मंदिर का सभा मण्डप बड़ा विशाल है। खम्भों पर खुदाई देखते ही बनती है। छः फुट ऊँची सुन्दर चारमुखों वाली मूर्ति की स्थापना सिसोदिया वंश के महारावल जगमाल ने की थी। मंदिर की मरम्मत 1495 में कल्ल के बेटे देवदत्त ने कराई थी। मंदिर के बाहर संगमरमर के 6 पत्थरों पर नवग्रहों की मूर्तियां बड़ी सुन्दरता से खुदी हुई है। मंदिर से सटा हुआ एक तालाब जिस पर एक घाट बना हुआ है ब्रह्माजी का घाट कहलाता है।

कलिंजरा के जैन मंदिर-  बांसवाड़ा से 30 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम में हिरन नदी के तट पर बसे कलिंजरा ग्राम के जैन मंदिर प्रसिद्ध है। यहां पर एक बड़ा शिखरबन्द पूर्वाभिमुख जैन मंदिर है। इसके दोनों पार्श्वों में और पीछे एक-एक शिखरबन्द मंदिर बना हुआ है और चारों तरफ देव कुलिकाएं है। यह मंदिर दिगम्बर जैनों का है और ऋषभदेव के नाम से विख्यात है। इसमें छोटी बड़ी कई मूर्तियां है। एक मंदिर में पार्श्वनाथ जी की खड़ी मूर्ति है, जिसके आसन पर वि.सं. 1578 का लेख है।

त्रिपुरा सुन्दरी माता मंदिर- तलवाड़ा ग्राम से 5 किमी दूर स्थित भव्य प्राचीन त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर है जिसमें सिंह पर सवार भगवती अष्टादश भुजा की मूर्ति है। मूर्ति की अष्टादश भुजाओं में अठारह प्रकार के आयुध है। पैरों के नीचे प्राचीनकालीन कोई यंत्र बना हुआ है इसे श्रद्धालु त्रिपुरा सुन्दरी तरतई माता एवं त्रिपुरा महालक्ष्मी के नाम से भी सम्बोधित करते है। इस मंदिर की गिनती प्राचीन शक्ति पीठ में होती है।
    
    त्रिपुरा सुन्दरी के इस मंदिर की स्थापना कब हुई है, इस का अधिकृत उल्लेख तो नहीं मिलता है परन्तु मंदिर में भगवती के उत्तर विभाग में सम्राट कनिष्क के समय का एक शिव लिंग आज भी विद्यमान है। ऐसे शिव लिंग नीलकण्ठ महादेव के मंदिर तथा अन्य शिव मंदिरों में भी विद्यमान है। अतः इससे पता चलता है कि त्रिपुरा सुन्दरी का यह शक्तिपीठ सम्राट कनिष्क के पूर्व का बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर के जीर्णोद्धार के लगभग 6 लाख रुपये व्यय हुए। यज्ञ, मण्डप, धर्मशाला एवं चारी दीवारी भी बनाई गई है। जीर्णोद्धार में मंदिर की प्राचीन स्थापत्य कला को पूर्ण रूप से अक्षुण्ण रखा गया है। मंदिर में खण्डित मूर्तियों का संग्रहालय भी बना हुआ है जिसकी शिल्पकला अद्वितीय है।
    मंदिर में प्रतिदिन दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है। यह मंदिर सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। प्रतिवर्ष नवरात्रि में यहां भारी मेला भी लगता है इसमें हजारों श्रद्धालु नर-नारी आकर देवी के दर्शन करते है। यह मंदिर सैलानियों का भी प्रमुख आकर्षण केन्द्र है।

अरथुना के प्राचीन भग्नावशेष मंदिर- अरथुना, बांसवाड़ा के दक्षिणी में 55 किमी दूर स्थित प्राचीन कस्बा है। यह बांसवाड़ा से गलियाकोट सड़क मार्ग पर स्थित है। पास ही में अमरावती नगरी के भग्नावशेष ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका नाम उत्थुनक मिलता है। शिल्पकला की दृष्टि से आबू के मंदिरों की कला में यहां के मंदिरों की कला में बहुत अधिक साम्य है। अरथुना ग्राम की अनेक टेकरियों की खुदाई में मंदिर मिले हैं। पुरातात्विक दृष्टि से इसकी रक्षा हेतु पुरातत्व विभाग सक्रिय है। खुदाई से प्राप्त अनेक शिव, वैष्णव व जैन मंदिरों की टूटी मूर्तियों का संग्रहालय हनुमानगढ़ी के पास बनाया गया है। इन संग्रहित मूर्तियों की स्थापना कला बेजोड़ है। इस क्षेत्र के खेतों में हल के साथ ईंटें बाहर निकल आती हैं जिनसे पता चलता है कि यहां धरती के भीतर अनेक मंदिर व प्रासाद दबे पड़े हैं।
तलवाड़ा के प्राचीन मंदिर- बांसवाड़ा के लगभग 15 किमी पश्चिम में 11वीं शताब्दी के आस-पास का बना हुआ जीर्ण-शीर्ण सूर्य मंदिर है, जिसमें सूर्य की मूर्ति एक कोने में रखी हुई है और बाहर के चबूतरे पर सूर्य के रथ का एक चक्का टूटा पड़ा है। उसके निकट श्वेत पत्थर की बनी हुई नवग्रहों की मूर्तियां हैं। सूर्य मंदिर के पास ही बारहवीं शताब्दी के आसपास का बना हुआ लक्ष्मीनारायण का मंदिर है जिसका नीचे का हिस्सा प्राचीन व ऊपर का नया है। मूर्ति सभा मण्डप में पड़ी है। एक ताक में ब्रह्मा की मूर्ति भी है।
    सूर्य मंदिर के निकट ही एक जैन मंदिर है जिसका थोड़ा ही अंश अवशेष रहा है। बाहर एक खेत में वहां की दो दिगम्बर मूर्तियां हैं, जो कारीगरी की दृष्टि से बहुत उत्तम हैं। उनमें से एक के नीचे वि.सं. 1123 का लेख है। इस मंदिर के सामने ही थोड़ी दूरी पर गदाधर का जीर्ण-शीर्ण मंदिर है जिसकी छत पर आबू के प्रसिद्ध विमलशाह के मंदिर जैसी सुन्दर कारीगरी है। कारीगरी की दृष्टि से यहां की शिल्पकला अद्वितीय है।

अन्य दर्शनीय स्थल- संगमेश्वर त्रयम्बकेश्वर कपालेश्वर रामेश्वर, घाटी रणछोड़, जगपुरा, जगमेश्वर सूरतगढ एवं मानगढ़ के पठार जीरकोटा, गदरिया, फाटीखान् बोरेश्वर, अलोपेश्वर सलाखडेश्वर परसोलिया. अन्देश्वर मंगलेश्वर अन्य रमणीक स्थल है जो नदी नालों के किनारे एवं पहाड़ियों के बीच स्थित है। इसके अलावा बांसवाड़ा को रोशन करने वाला माही परियोजना बांध 16 किमी की दूरी पर स्थित है। माही बजाज सागर बांध के निर्माण के पश्चात् बांसवाड़ा पर्यटकों के लिए पर्यटन स्थल हो गया है।
निष्कर्ष- बांसवाड़ा जिले में जनजातियों से जुड़े अनेक प्रमुख ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन स्थल है आदिम धरोहर एवं आस्था केंद्र के रुप में पूजनीय एवं वंदनीय है। इन स्थलों का संरक्षण करते हुए राजस्थान पर्यटन परिपथ से जोड़कर इनके विकास से जिले में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार भी प्राप्त होगा।

संदर्भ ग्रन्थ सूची- 
1.व्यास, राजेश कुमार (2004) "राजस्थान में पर्यटन        प्रबन्ध" राजस्थानी ग्रन्थालय जोधपुर।
2.गुप्ता, शिवसहाय (2010) "पर्यटन के विविध                 स्वरूप"   मोहित बुक्स इन्टरनेशनल, नई दिल्ली।
3.बंसल, सुरेशचन्द्र (2011) "पर्यटन भूगोल एवं यात्रा         प्रबन्धन" साहित्य सागर प्रकाशन, चौडा रास्ता               जयपुर।
4.यादव, रघुवीर (2011) "सम्पूर्ण भारत के सांस्कृतिक      पर्यटन स्थल" चन्दा पब्लिकेशन्स, इलाहाबाद, उत्तर         प्रदेश।
5.शर्मा, महेश (2013) "भारत के पर्यटन स्थल"                डायमंड  पॉकेट बुक्स प्रा.लि.
6.डॉ. नेगी (1992) "पर्यटन एवं यात्रा के सिद्धान्त"           तक्षशिला प्रकाशन नई दिल्ली।
7.कर्नल जेम्स टॉड (1988) "राजस्थान का इतिहास"          श्याम प्रकाशन, जयपुर।
8.शर्मा, प्रो. के. के. (1989) "राजस्थान में पर्यटन             विकास" प्रगति प्रकाशन, जयपुर (राज.)
9.एच भीष्मपाल (2012) "पर्यटकों का आकर्षण :            राजस्थान" आकृति प्रकाशन शाहदरा दिल्ली।
10.कर्नल टॉड कृत "राजस्थान का इतिहास", श्याम              प्रकाशन, जयपुर 1988


            Dr. Kantilal Ninama 
             Lecturer - History 
            Govt. College Ghatol
              Banswara Rajasthan 

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
Nice article sirji
बेनामी ने कहा…
Bahut badiya

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