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पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी: चुनौतियां और संभावनाएं

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प्रस्तावना- भारत की ग्राम-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में पंचायती राज संस्थाएँ शासन की सबसे निचली, लेकिन सबसे प्रभावी इकाइयाँ हैं। इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय विकास, सामाजिक न्याय और सहभागी लोकतंत्र को वास्तविक रूप मिलता है।   भारत के कुल जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय समाज से आता है, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना विशिष्ट रही है। इस समाज में महिलाओं की भूमिका परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रही है, किंतु औपचारिक राजनीतिक संरचनाओं में उनकी भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही।   73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए पृथक प्रावधानों ने जनजातीय महिलाओं को स्थानीय शासन में प्रवेश का अवसर प्रदान किया। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर अनेक संरचनात्मक, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। प्रस्तुत लेख में पंचायत स्तर पर जनजातीय महिलाओं की भागीदारी की वर्तमान स्थिति, मुख्य चुनौतियाँ तथा भविष्य की संभावनाएँ का विश्लेषण किया गया है। पंचायती राज व्यवस्थाः एक संक्षिप्त परिचय- पंचायती राज व्यवस्था भारत में स्थानीय स्वशासन की स...

सतत विकास में आदिवासी स्वदेशी ज्ञान का महत्व

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     आदिवासी देशज ज्ञान (Indigenous Knowledge Systems) वह अनुभवजन्य, स्थानीय और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित ज्ञान है जो प्रकृति, समाज और आजीविका के बीच संतुलन पर आधारित है। सतत विकास (Sustainable Development) के संदर्भ में यह ज्ञान अत्यंत प्रासंगिक और प्रभावी है। 1.प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग-       आदिवासी समुदाय जंगल, जल, भूमि और जैव-विविधता का उपयोग संरक्षण के सिद्धांत पर करते हैं। * सामुदायिक वन प्रबंधन *नियंत्रित शिकार व संग्रह *जलस्रोतों की पवित्रता और संरक्षण       ये सभी आज के पर्यावरणीय संकट (जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई) के समाधान में सहायक हैं। 2.पारंपरिक कृषि और खाद्य सुरक्षा-     आदिवासी कृषि पद्धतियाँ जैसे- *मिश्रित खेती (Mixed Cropping) *देशी बीजों का संरक्षण *जैविक खाद और कीटनाशक     ये पद्धतियाँ मृदा उर्वरता, जल संरक्षण और पोषण सुरक्षा को बनाए रखती हैं। 3.जैव-विविधता संरक्षण-     आदिवासी ज्ञान में औषधीय पौधों, वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की गहरी समझ है। *लोक औषधि *बीज संरक्षण...

आदिवासी देशज ज्ञान: भारतीय ज्ञान प्रणाली के विकास में योगदान NEP2 020 के संदर्भ में

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    भारतीय ज्ञान प्रणाली का विकास विभिन्न शास्त्रीय, लोक एवं देशज परंपराओं के समन्वय से हुआ है, जिसमें राजस्थान के आदिवासी समाजों- भील, मीणा, गरासिया, डामोर एवं सहरिया - द्वारा विकसित देशज ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यह ज्ञान मुख्यतः अनुभवजन्य, मौखिक तथा प्रकृति-आधारित रहा है, जिसने कृषि, जल-संसाधन प्रबंधन, वन संरक्षण, औषधीय ज्ञान, लोकचिकित्सा एवं सामाजिक संगठन के क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान प्रणाली को व्यवहारिक आधार प्रदान किया।     भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System - IKS) केवल शास्त्रीय ग्रंथों, वेदों या दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें भारत के आदिवासी समाजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित लोकज्ञान (Indigenous Knowledge) का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आदिवासी लोकज्ञान प्रकृति, समाज और जीवन के साथ संतुलन पर आधारित एक व्यावहारिक ज्ञान प्रणाली है, जिसने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया है।     आज जब सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और वैकल्पिक ज्ञान प्रणालियों की आवश्यकता बढ़ रही है, तब आदिवासी लोकज्ञान का महत्व और भी बढ़ जाता है।    यह ऐत...

आदिवासी युवाओं में वैश्वीकरण एवं आधुनिकता का प्रभाव

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 सार (Abstract) - वैश्वीकरण और आधुनिकता ने भारतीय समाज की संरचना को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। इसका प्रभाव आदिवासी समाज, विशेषकर आदिवासी युवाओं पर अत्यंत गहरा एवं बहुआयामी रहा है। एक ओर आधुनिक शिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, रोजगार और वैश्विक संपर्क के नए अवसर उपलब्ध हुए हैं, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक विघटन, पहचान संकट, पारंपरिक आजीविका का ह्रास तथा सामाजिक असंतुलन जैसी समस्याएँ भी उभरकर सामने आई हैं। यह शोध-पत्र आदिवासी युवाओं पर वैश्वीकरण एवं आधुनिकता के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विश्लेषण करता है तथा संतुलित विकास हेतु नीतिगत सुझाव प्रस्तुत करता है। मुख्य शब्द (Keywords):आदिवासी युवा, वैश्वीकरण, आधुनिकता, सांस्कृतिक परिवर्तन, सामाजिक परिवर्तन प्रस्तावना (Introduction)- भारत की आदिवासी जनसंख्या देश की सांस्कृतिक विविधता का अभिन्न अंग है। परंपरागत रूप से आदिवासी समाज प्रकृति, सामूहिकता और आत्मनिर्भर जीवन-पद्धति पर आधारित रहा है। किंतु वैश्वीकरण एवं आधुनिकता के प्रसार ने आदिवासी युवाओं की जीवनशैली, सोच, आकांक्षाओं और सामाजिक मूल्यों में तीव्र परिवर्तन ...

जनजाति क्षेत्र बांसवाड़ा जिले में प्रमुख पर्यटन स्थल एवं उनका सांस्कृतिक महत्व

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     पर्यटन के प्रति आरंभ से ही मनुष्य की रूचि रही है। इस रूचि के कारण ही लोग पहले लम्बी-लम्बी यात्राएं वर्षों तक किया करते थे। अपने समृद्धशाली व वैविध्यपूर्ण पर्यटन स्थलों के कारण राजस्थान आरंभ से ही पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। यहां कहीं दूर तक फैला रेत का समन्दर पर्यटकों को मौन आमंत्रण देता है तो कहीं शीतलता का एहसास कराती यहां की झीलें व नदियां स्वतः ही पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। दरअसल जितनी समृद्ध यहां की लोक परम्पराएं व विरासत की वस्तुएं है इतना ही वैभवपूर्ण है यहां के किला व महलों का सौंदर्य। "पधारों म्हारै देश" के आमंत्रण के साथ पर्यटन का विकास तेजी से बढ़ रहा है। पर्यटन की आधारिक संरचना-       राजस्थान में पर्यटन की आधारिक संरचना का अधिकतर कार्य सरकारी क्षेत्र में पर्यटन विभाग द्वारा ही किया हुआ है। ऐसे में पर्यटन प्रबन्ध का समस्त जिम्मा भी राज्य सरकार ही अपने पर ओढ़े हुए है। राज्य में पर्यटन गतिविधियों को प्रोत्साहन तो रियासत काल से ही प्रारम्भ हो गया था परन्तु व्यवस्थित रूप से पर्यटन का विकास वर्ष 1955 में राज्य में पर्यटन-व...

PESA ACT1996: ग्राम सभा के अधिकार और आदिवासी स्वशासन की संवैधानिक व्यवस्था

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प्रस्तावना (Introduction) - भारत एक बहु-जातीय और बहु-संस्कृतिक देश है, जहाँ आदिवासी समाज की अपनी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक परंपराएँ रही हैं। स्वतंत्रता के बाद पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 73वाँ संविधान संशोधन किया गया, परंतु यह व्यवस्था पूर्ण रूप से आदिवासी क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थी। इसी कमी को दूर करने के लिए पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996, जिसे सामान्यतः PESA Act कहा जाता है, लागू किया गया।     मुख्य शब्द (Keywords): PESA Act, ग्राम सभा, अनुसूचित क्षेत्र, आदिवासी स्वशासन, लोकतांत्रिक PESA Act 1996 क्या है?    ।PESA Act 1996 एक केंद्रीय कानून है, जिसका उद्देश्य संविधान की पाँचवीं अनुसूची में आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाओं को स्थानीय परंपराओं और आदिवासी जीवन पद्धति के अनुसार सशक्त बनाना है। यह अधिनियम मुख्य रूप से इन राज्यों पर लागू होता है: • मध्य प्रदेश • राजस्थान • गुजरात • महाराष्ट्र • छत्तीसगढ़ • झारखंड • ओडिशा • आंध्र प्रदेश • तेलंगाना .हिमाचल प्रदेश PE...

भारत की आदिम जनजातियां: सामाजिक - सांस्कृतिक संरचना एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां

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 सार (Abstract)     भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ आदिम जनजातियाँ आज भी अपनी प्राचीन जीवन-शैली, सांस्कृतिक परंपराओं एवं स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के साथ अस्तित्व में हैं। भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया है, जिनमें से कुछ जनजातियाँ अत्यंत संवेदनशील अवस्था में हैं, जिन्हें वर्तमान में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) कहा जाता है। यह शोध-पत्र भारत की आदिम जनजातियों की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, आर्थिक जीवन, धार्मिक विश्वासों, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों तथा समकालीन चुनौतियों का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है। साथ ही, सरकारी नीतियों एवं संरक्षण प्रयासों की प्रभावशीलता का विश्लेषण भी किया गया है। Key Words: Primitive Tribes of India, PVTGs, Indigenous Knowledge Systems, Tribal Culture, Conservation प्रस्तावना (Introduction)-  भारत की जनजातीय संस्कृति मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरणों की जीवंत अभिव्यक्ति है। आदिम जनजातियाँ वे समुदाय हैं जिन्होंने ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं सामाजिक कारणों से आधुनिक विकास की मुख्यधारा से दूरी बन...