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आदिवासी विकास हेतु भारतीय संविधान में उल्लेखित प्रमुख प्रावधान

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      भारत विभिन्न समुदायों का एक सांस्कृतिक संगम है। जिसमें सभी पंथों, धर्मों, वर्गों एवं जातियों के विकास हेतु भारतीय संविधान में अनेक प्रावधान निहित है।आदिवासियों की विशेष आवश्यकताओं को समझते हुए भारत के संविधान में इन समुदायों के हर संभव शोषण से बचाव के लिए कतिपय विशेष रक्षोपाय किए गये है और इस प्रकार सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया गया है। अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत सभी को समान अधिकार और अवसर प्रदान किये गये है। अनुच्छेद 15 लिंग, धर्म, जाति, वर्ण आदि के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव का निषेध करता है। अनुच्छेद 15(4) किसी भी सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिक के पक्ष में जिसका राज्य की राय में राज्य के अन्तर्गत सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं है ,नियुक्तियों अथवा पदों में आरक्षण हेतु व्यवस्थाएं करे। अनुच्छेद 46 राज्य को आदेश देता है कि वह कमजोर वर्गों खासतौर पर आदिवासियों के शैक्षिक तथा आर्थिक हितों की विशेष देखभाल तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा प्रदान करने का आश्वासन देता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार र...

भील जनजाति में दीपावली का त्यौहार एवं सामाजिक महत्व

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     त्यौहार एवं उत्सव मानव-समाज के उल्लास के प्रतीक हैं। इनके माध्यम से विह्वल मांनव अपनी दुःख मय जीवन-कथा को सुखी बनाता है और कुछ समय के लिए स्वर्गीय वातावरण में अपने आपको निमग्न कर लेता है।        भील जनजाति के उत्सव उनकी आस्थाओं, विश्वासों एवं परम्पराओं के परिचायक हैं। इनसे हम इनके देवी-देवताओं से अवगत होते हैं और इनकी सामाजिक भावानाओं को सहज ही समझ लेते हैं। अन्य आदिवासियों की तरह भील भी आस्तिक हैं और श्रद्धावान होने के कारण वे अपने प्रत्येक उत्सव (धार्मिक अथवा सामाजिक) को देवी-देवता की आराधना से प्रारम्भ करते हैं। नवीन अन्न की प्राप्ति पर वे आनन्द से झूम उठते हैं और इसे सर्वप्रथम अपने देवता के चरणों में रखकर अपनी कृतज्ञता का प्रकाशन करते हैं। परिचय - भारत त्यौहारों का देश है जहाँ प्रत्येक समुदाय अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार पर्व मनाता है। इन्हीं विविधताओं के बीच राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी राजस्थान की वागड़ भूमि में निवास करने वाली भील जनजाति अपनी विशिष्ट लोकसंस्कृति और उत्सवों के लिए जानी ...

दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी समाज में विवाह की अनूठी परम्परा -"नोतरा प्रथा" गांव वाले एवं रिश्तेदार करते है मदद

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    दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी समाज सामुदायिक भावना, सामूहिक जीवन और सामूहिक उत्सव एवं परम्पराओं को मनाने के लिए राजस्थान ही नहीं पुरे देश में प्रसिद्ध है। भील समुदाय की सामुदायिक भावना सामेला प्रथा,नोतरा प्रथा विश्वप्रसिद्ध है। दक्षिणी राजस्थान का आदिवासी समुदाय सुख-दुःख, शादी-ब्याह, मौत-मरण, और पारस्परिक सहयोग और सामाजिक एकता के लिए प्रसिद्ध है। जनजातीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि दो परिवारों और पुरे समुदाय का उत्सव होता है। इस विवाह प्रकिया में " आर्थिक सहयोग की परम्परा" एक अनूठी सामाजिक प्रथा है जो गरीब आदिवासी परिवार अपने बच्चों की शादी नोतरा प्रथा से ही  करा पाते है। शादी का खर्च उठा पाते हैं।       दक्षिणी राजस्थान की अनूठी परम्परा है नोतरा प्रथा   यह आदिवासी अंचलों में परस्पर सहयोग की एक ऐसी परम्परा जीवित है जो पूरी तरह विश्वास और सामूहिक भागीदारी पर टिकी है। नोतरा प्रथा से सिर्फ शादी ही नहीं बल्कि अन्य आवश्यकताओं को भी सामुदायिक सहयोग से पूरा किया जाता है नोतरा प्रथा -  नोतरा प्रथा एक सामुदायिक...

आदिवासी लोक संस्कृति में भील जनजाति के लोकगीतों एवं लोकनृत्यों का ऐतिहासिक महत्व

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      भारत एक विविधता से भरा हुआ देश है जहाँ विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवनशैलियाँ देखने को मिलती हैं। इन्हीं विविधताओं के बीच आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपराओं के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदिवासी संस्कृति की आत्मा उनके लोकगीतों और लोकनृत्यों में बसती है। ये दोनों न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि उनके जीवन दर्शन, सामाजिक एकता, धार्मिक विश्वास और भावनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी हैं। आदिवासी लोक संस्कृति में लोकगीतों और लोकनृत्यों का गहरा महत्व है, क्योंकि इनके माध्यम से ही उनकी संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहती आई है।      आदिवासी लोक संस्कृति मौखिक परंपराओं, गीतों, नृत्यों, कहानियों और अनुष्ठानों पर आधारित होती है। यह संस्कृति लिखित ग्रंथों पर नहीं, बल्कि स्मृति और अभिव्यक्ति पर निर्भर करती है। आदिवासी समाज प्रकृति के अत्यंत निकट रहता है और उसका संपूर्ण जीवन पर्यावरण से जुड़ा होता है। जंगल, नदी, पर्वत, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि सभी उनके जीवन और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। इसी संबंध को वे अपने लोकगीतों और ल...

आस्था एवं विश्वास का प्रमुख केंद्र वागड़ का त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर

       दक्षिणी राजस्थान का वागड़ क्षेत्र अपनी लोक संस्कृति और आध्यात्मिकता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां पर लोक आस्था और धार्मिक दृष्टि से अनेक मंदिर और उपासना केंद्र है जिसमें विश्व प्रसिद्ध है मां त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर जो बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 15कि.मि.दूर स्थिति तलवाड़ा के पास उमराई गांव की पहाड़ियों में स्थित मां त्रिपुरा सुंदरी माता का एक प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है।        राजस्थान के दक्षिणी अंचल में स्थित वागड़ क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की भूमि आदिकाल से देवी उपासना की भूमि रही है। वागड़ की धरती पर कई देवी-देवताओं के तीर्थस्थल विद्यमान हैं, जिनमें सबसे प्रमुख और पूजनीय स्थान है - त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर , जो बांसवाड़ा जिले में स्थित है। यह मंदिर न केवल वागड़ की आस्था का केंद्र है, बल्कि राजस्थान की शक्ति उपासना परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है।   परिचय-  त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर बांसवाड़ा जिले के तलवाड़ा कस्बे के पास स्थित है। यह मंदिर वागड़ क्षेत्र के स...

वनाधिकार अधिनियम 2006-परंपरागत से कानूनी अधिकार तक

     वन आदिवासियों की धरोहर एवं शरण स्थली रहे है। वनों से ही उनकी संस्कृति की सुरक्षा और गरिमा प्रदान होती रही हैं। वन और आदिवासी एक -दूसरे के पूरक है।वस्तुतः वन जनजातियों के पोषक रहे है। जिनसे उन्हें विभिन्न प्रत्यक्ष लाभ जैसे ईधन, मवेशियों के लिए चारा मकान निर्माण के लिए लकड़ी खाद, फल-फूल, सब्जियां खाने योग्य कन्दमूल, चिभिन्न प्रकार की लकड़ियां, जडी-बूटिया अनेक वाणिज्य उपयोगी लघु वन उत्पादित वस्तुएं आदि प्राप्त हुए है। अप्रत्यक्ष लाभ-स्वच्छ और शीतल वायु, पक्षियों का कलरव, संतुलित तापमान समय पर वर्षा, हरियाली, खुशबू आंधी और तूफान से रोक तथा बाढ़ आदि से बचाव भी होता रहा है।       वनों के संरक्षण से ही जनजातियों के परम्परागत विश्वास ,प्रथाएं ,रिवाज, लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाए, लोकमान्यताएं उनकी बोली तथा उनके जादू-टोने आदि की बाहरी दुनिया के हस्तक्षेप से रक्षा होती रही है। अतः वनों से न सिर्फ उन्हें मातृत्व तुल्य लाभ प्रदान हुआ है बल्कि उन्हें आश्रय, भोजन, रोजगार तथा सुदृढ संस्कृति भी प्रदान होती रही है। परंतु ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं भारतीय वन नीति के अतिरिक्त ...

आदिवासियों की प्राकृतिक- धरोहर साझा वन प्रबंधन

     जनजातीय समुदाय आज भी देश की मुख्य धारा से पृथक है। यह समुदाय सर्वाधिक उपेक्षित और राजनीतिक दृष्टि से भी सबसे कम शक्तिशाली है। देश के विभिन्न भागों में ऐस समुदाय अपने देश की प्रमुख भाषा, धर्म, संस्कृति और शक्ति संरचना से अलग-थलग देखे जा सकते हैं। इन समुदायों के साथ रंग, जाति, धर्म, कानून एवं पूर्वाग्रहों के आधार पर सामाजिक जीवन में भी भेद किया जा सकता है।       अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी परिवर्तन के बावजूद विश्व के दूर-दराज क्षेत्रों में लगभग 50 करोड़ आदिवासी हैं जिनके पास अमूल्य पारिस्थितिकी वन की सम्पदा सुरक्षित हैं। इन आदिवासियों और वनों के बीच एक अटूट रिश्ता है अर्थात् आदिवासियों के लिए वन उनके जीवन का आधार है। इन आदिवासियों के पास उपलब्ध पर्यावरणीय जानकारी एवं बुद्धिमता से प्रकृति और मनुष्य के बीच उचित सम्बन्धों को समझने में भी सहायता मिल सकती है ।लेकिन दुर्भाग्य यह है कि प्रौद्योगिकी विकास, पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति की आंधी में आदिम और मूल संस्कृतियाँ, भाषाएँ, रीति रिवाज और जीवन शैली उखड़कर नष्ट हो रही है जिसके कारण समृद्ध पर्यावरणीय...