जनजातीय विरासत स्वदेशी ज्ञान और परंपरागत औषधीय ज्ञान का एक ऐतिहासिक अध्ययन
राजस्थान का जनजाति बहुल वाग्वर अंचल दक्षिणी राजस्थान अपने पुरातत्व, शिल्प स्थापत्य, आदिम संस्कृति के साथ ही समृद्ध इतिहास के लिए प्रदेश में ख्यातनाम रहा है। दक्षिणी राजस्थान में जनजातीय समाज कई जातियों, उपजातियो और वर्गों में विभक्त है। समाज की मूल इकाई परिवार है। यहां की आदिवासी आबादी सुदूर पहाडी क्षेत्रों में बिखरी हुई बस्तियों में ढाणी एवं फलों में रहती है। आदिवासी समाज कई सामाजिक बुराईयों, अंध-विश्वास, डायन प्रथा, तंत्र मंत्र, बाल विवाह, निरक्षरता, गरीबी, अज्ञानता और बेरोजगारी से जकड़ा हुआ है। पारिवारिक स्वतंत्रता, अपनी इच्छानुसार निवास एवं रहन सहन आदिवासी समाज की विशेषता है।
नैसर्गिक सौन्दर्य श्री से लकदक वागड अंचल रणमीय पहाडियों से घिरा हुआ है। चितराई उपत्यकाओं के बीच विविध जलाशय और उनमें कलरव करते देशी-विदेशी परिन्दें जहां इस अंचल की नैसर्गिक सुषमा में अभिवृद्धि करते है वहीं मनोहारी आदिम सस्कृति और परम्पराओं के साथ-साथ मेलो, पर्वो और उत्सवों में उन्मक्त मन से शिरकत करते यहां के आदिवासियों की किलकाकारियां वर्ष भर इस अंचल की नीरव वादियों को स्पंदित करती रहती है।
दक्षिणी राजस्थान की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत और स्वदेशी ज्ञान अत्यंत समृद्ध है जिसमें निश्चल जीवन का आह्लाद और संघर्ष प्रतिबिबित है। जनजातीय जीवन शैली में आलोकित आनन्द समूचे प्रदेश की ऊर्जा और उसका दैनदिन संघर्ष सभी प्रदेशवासियों की प्रेरणा है। जनजातीय समुदाय अथवा समाज की जीवन शैली, खानपान परिधान रहन-सहन, मान्यताएं, परंपराएं, प्रथाएं लोककथाएं, लोक विश्वास, धार्मिक आस्था, अनुष्ठान, पर्व, त्यौहार, सामाजिक व्यवहार, नियम बंधन, संस्कार, लोकगीत, लोकनृत्य, औषधि ज्ञान एवं पारिस्थितिकीय ज्ञान अनुपम और अमूल्य धरोहर है। पडौसी राज्यों गुजरात तथा मध्यप्रदेश से सांस्कृतिक समरसता के कारण जनजातीय संस्कृति इंद्रधनुषी घटाओं से सुसज्जित है।
जनजातीय समाज और उसकी परंपरा हमारी संस्कृति की विरासत है। वैश्वीकरण के इस दौर में पारंपरिक औषधीय ज्ञान के साथ आर्थिक मूल्य की जानकारी हमें आदिवासी संस्कृति से मिलती है। सांस्कृतिक विरासत का अर्थ है समाज के व्यक्तियों का या समूहों की जीवनशैली जो भाषा, कला, कलाकृतियों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होने वाले उनके गुणों में व्यक्त होती है। यह पूर्वजों, उनके विश्वासों और उनके जीवन जीने के तरीके के बारे में बताती है। यह मूर्त या अमूर्त हो सकती है। मूर्त सांस्कृतिक विरासत का अर्थ है वे चीजे जिन्हें कोई व्यक्ति भौतिक रूप से संग्रहित और स्पर्श कर सकता है। इसमें कपड़े, स्मारक और पुरातात्विक स्थल शामिल है। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का अर्थ है ऐसी चीजे जो बौद्धिक रूप से मौजूद हैं, उनके पास मूल्य, विश्वास, सामाजिक प्रथाएं, त्यौहार आदि होते है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना आवश्यक है।
स्थानीय और स्वदेशी ज्ञान से तात्पर्य उन समाजों द्वारा विकसित समझ, कौशल और दर्शन से है, जिनका अपने प्राकृतिक परिवेश के साथ संपर्क का लंबा इतिहास रहा है। ग्रामीण और स्वदेशी लोगों के लिए स्थानीय ज्ञान दिन-प्रतिदिन के जीवन के बुनियादी पहलुओं के बारे में निर्णय लेने में सहायक है। यह ज्ञान एक सांस्कृतिक परिसर का अभिन्न ज्ञान है जिसमें भाषा, वर्गीकरण प्रणालियां, संसाधन इतिहास रहा है। ग्रामीण और स्वदेशी लोगों के लिए स्थानीय ज्ञान दिन-प्रतिदिन के जीवन के बुनियादी पहलुओं के बारें में निर्णय लेने में सहायक है। यह ज्ञान एक सांस्कृतिक परिसर का अभिन्न अंग है जिसमें भाषा, वर्गीकरण प्रणालियां, संसाधन उपयोग, प्रथाए, सामाजिक अंतःक्रियाए, अनुष्ठान और आध्यात्मिकता भी शामिल है।
यह ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, आध्यात्मिक और राजनीतिक परिवर्तनों के अनुकूल है। यह प्रकृति के निकट रहने से सदियों से विकसित ज्ञान और कौशल का एक समूह है। जीवन के सभी पहलू आपस में जुड़े हुए हैं और उन्हें अलग-अलग करके नहीं बल्कि समग्रता के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। स्वदेशी ज्ञान में जीवन के सभी पहलू शामिल है - आध्यात्मिकता, इतिहास, सांस्कृतिक प्रथाएं, सामाजिक संपर्क, भाषा और उपचार।
स्वदेशी ज्ञान यह नहीं बताता कि प्रकृति को कैसे नियंत्रित किया जाएं बल्कि यह बताता है कि सृष्टिकर्ता के उपहारों के साथ सामंजस्य में कैसे रहा जाए ? सामूहिक समृद्धि एक समुदाय के भीतर, भाषा, कहानियों, गीतों, समारोहों, किवदन्तियों और कहावतों के माध्यम से मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। स्वदेशी ज्ञान ही सतत् सामाजिक और आर्थिक विकास की कुंजी है। स्वदेशी ज्ञान में नैतिकता है, प्रकृति के साथ व्यवहार करने का सही और गलत तरीका प्राकृतिक दुनिया का सम्मान करने के लिए निर्माता द्वारा दी गई जिम्मेदारी।
जनजातीय पारंपरिक स्वदेशी ज्ञान के संरक्षण से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। विरासत संरक्षण भी जनजाति लोगों की काफी मदद करेगा। सांस्कृतिक विरासत स्मारकों और वस्तुओं के संग्रह तक ही सीमित नहीं है। इसमें हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली परंपराएं या जीवंत अभिव्यक्तियां भी शामिल है, जो हमारे वंशजों की दी गई है। जैसे - मौखिक परंपराएं, कला-प्रदर्शन, सामाजिक प्रथाएं, अनुष्ठान, उत्सव, कार्यक्रम आदि।
दक्षिणी राजस्थान का जनजातीय समुदाय प्रायः वनों के निकट एवं वन क्षेत्र में निवास करते हैं। प्रकृति की रागात्मकता और लीला मुद्राओं से उनका गहरा संबंध है। निसर्ग के लगभग सभी जीवनोपयोगी उपादान उनके आराध्य है। वे प्रकृति की छोटी-छोटी शक्ति में सर्वशक्तिमान की छवि पाते हैं। धरा, आकाश,
सूरज, चंद्रमा मेघ, वर्षा, पर्वत, वृक्ष, पशु-पक्षी, सर्प, कीड़े-मकोड़े यहां तक की कंदमूल भी अपने अपनी श्रद्धा का पात्र है। पशु पक्षी और वनस्पतियों में से अनेक उनके गोत्र देवता के रूप में पूज्य तो हैं ही। आस्था का यह निश्चल रूप ही अनुष्ठानों की प्रेरणा भूमि है।
जनजातीय विरासत स्वदेशी ज्ञान, भारत की समृद्ध और विविध सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान, कला, रीति-रिवाज और प्रकृति से गहरा जुड़ाव शामिल है। यह ज्ञान सदियों के अनुभव से प्राप्त होता है और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने पर केंद्रित है, जैसे कि स्थायी संसाधन प्रबंधन, स्वदेशी चिकित्सा कला और शिल्प। इस विरासत को संरक्षित करने के लिए सरकार और विभिन्न संगठन जनजातीय समुदायों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि उनके ज्ञान को बढ़ावा दिया जा सके और उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके।
जनजातीय विरासत और स्वदेशी ज्ञान की मुख्य विशेषताएं-
प्रकृति से संबंध: जनजातीय ज्ञान प्रकृति पर बहुत अधिक निर्भर करता है। उनके पास वनस्पतियों, जीवों और पर्यावरण के बारे में गहरा ज्ञान होता है, जो उन्हें टिकाऊ जीवन जीने में मदद करता है।
स्थायी संसाधन प्रबंधन: कई जनजातियाँ, जैसे कि अरुणाचल प्रदेश की अका जनजाति, शिकार और अन्य पारंपरिक तरीकों का उपयोग करके संसाधनों का टिकाऊ...स्वदेशी कला और शिल्पः जनजातीय समुदायों के पास मिट्टी के बर्तन बनाने और टोकरियाँ बुनने जैसे अद्वितीय कला और शिल्प कौशल हैं, जो उनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।
पारंपरिक चिकित्सा और ज्ञानः जनजातीय ज्ञान में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां शामिल हैं, जो जड़ी-बूटियों और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है
सांस्कृतिक और सामाजिक संरचनाः जनजातीय समाज की अपनी अनूठी सामाजिक संरचनाएं, भाषाएं, रीति-रिवाज और त्यौहार होते हैं, जो उनकी पहचान का एक अभिन्न अंग हैं।
सामुदायिक जीवनः यह ज्ञान अक्सर मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता हैl
संरक्षण के प्रयास-
सरकारी पहल: भारत सरकार 'जनजातीय गौरव वर्ष' जैसे अभियानों के माध्यम से जनजातीय विरासत को पहचानने और उसका सम्मान करने के लिए काम कर रही है।
ज्ञान का दस्तावेजीकरण: जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, भाषा और कला रूपों का दस्तावेजीकरण और प्रसार किया जा रहा है।
क्षमता निर्माण और सशक्तिकरण: जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाने के लिए क्षमता निर्माण पहल और नीति वकालत की जा रही है।
जन जागरूकता: जनजातीय समुदायों के अधिकारों और संस्कृति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए सेमिनार और कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं।
अनुसंधान और सहयोग: जनजातीय भूमि अधिकारों, सांस्कृतिक संरक्षण और आधुनिक कानूनों के बीच संबंधों पर अनुसंधान किया जा रहा है, साथ ही सरकारी निकायों, गैर-सरकारी संगठनों और जनजातीय समुदायों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
निष्कर्ष -इतिहास की निरंतरता को बनाए रखने में जनजाति संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह मानव सभ्यता के विकास क्रम की अनिवार्य कड़ी है। आजादी के बाद जनजातीय विकास को नई दिशा मिली है। विकास के अभिनव और प्रभावी प्रयासों से विभिन्न जनजाति समुदायों के सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक स्तर में अभूतपूर्व सुधार हुआ है। बस ध्यान यह रखा जाना है कि इन सारे प्रयासों के साथ विकास की मुख्यधारा में सम्मिलित होते हुए उनकी सांस्कृतिक परंपराओं और मातृभाषाओं में संचित वंचित संपदा के साथ पारम्परिक ज्ञान कोश न खो जाएं।
स्वदेशी ज्ञान का तात्पर्य आदिवासी संस्कृति के लिए विशिष्ट ज्ञान से है। जिसे अक्सर स्थानीय ज्ञान के रूप में जाना जाता है। स्थानीय ज्ञान से तात्पर्य स्थानीय समुदाय द्वारा विकसित समझ, कौशल और दर्शन से है, जिनका अपने प्राकृतिक परिवेश के साथ लंबे इतिहास और अनुभव हैं। स्वदेशी ज्ञान का प्रसारण अक्सर मौखिक परपराओं के उपयोग के माध्यम से पीढी दर पीढ़ी होता है। स्वदेशी ज्ञान न केवल स्वदेशी स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। जनजातीय ज्ञान पारिस्थिकीय तंत्र और उन तरीकों के बारे में बहुत कुछ कहता है जिनसे समुदाय प्राकृतिक संसाधनों की स्थिरता सुनिश्चित कर सकते है। स्वदेशी ज्ञान के अंतर्गत समारोह, संगीत, नृत्य, गीत, कलात्मक प्रथाएं, सांस्कृतिक परंपराएं, विचारधाराएं, आध्यात्मिकता और पारंपरिक औषधीय ज्ञान शामिल है।
जनजातीय स्वदेशी ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत हमारी सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण सीख देती है। आज के आधुनिक युग में भी यह ज्ञान हमें टिकाऊ जीवन (Sustainable Living) की राह दिखाता है।
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