वागड़ सेवा संघ के माध्यम से भील जनजाति का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
राजस्थान का यह सुदूर दक्षिणी भाग वागड़ प्रदेश के नाम से विख्यात है। आदिवासी भील बहूल यह क्षेत्र आधुनिक चमक-दमक से कटा हुआ अवश्य है तथापि प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा अक्षुण्ण बनाए रखने में यह अग्रणी है। वागड़ की जनजातियों ने अपनी सांस्कृतिक परम्परा, गीत, कथा, केवते एवं नृत्य की धरोहर को आज भी संजोएं रखा है। अनेक धार्मिक आस्थाओं और विश्वासों से प्रकट होता है कि जनजातीय सामाजिक जीवन सोलह संस्कारों से बंधा हुआ है। लगभग 80 प्रतिशत भील जनजाति आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23°.1 से 24°.1 उत्तरी अक्षांश एवं 73°.1 से 74°.1 पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर, पूर्व में मध्य प्रदेश तथा दक्षिणी पश्चिम में गुजरात राज्य की सीमाएं लगी हुई है। इसका क्षेत्रफल करीब 4000 वर्गमील है। जातियों की विविधता और उनकी विचित्रताओं के मामलों में राजस्थान एक समृद्ध प्रदेश रहा है। जातियों का निर्माण उनकी सामाजिक प्रथायें तथा उनके आर्थिक क्रिया कलाप इतिहास में गहराई तक जड़े जमाये हुए है। बीसवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में भीलों की दशा अत्यन्त शोचनीय थी। वे रियासती दमन के चक्र में पिस रहे थे। डूंगरपुर की सरकार सामन्त तथा अधिकारी उनका शोषण कर रहे थे। उनसे बेगार ली जाती थी। उन्नीसवीं सदी में पारित वन कानूनों के तहत भीलों से लकड़ी, शहद, महुआ, फल, लाख आदि अन्य वस्तुएं एकत्रित करने पर रोक लगा दी। पहले के समान वे अब अपने घरों में शराब नहीं बना सकते थे। राज्य की ओर से सेना में नियुक्त पठान (विलायती) आदिवासियों के साथ निर्दयतापूर्ण व्यवहार कर भूमिकर वसूल करते थे। ऐसी विषम परिस्थितियों में गोविन्द गिरी ने धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन प्रारंभ किया। उन्होंने भीलों में व्याप्त विभिन्न बुराइयों को त्यागने का आदेश दिया। गोविन्द गिरि ने सामन्तों, व्यापारियों व अन्य उच्च अधिकारियों के आर्थिक शोषण के विरूद्ध भी आवाज उठाई। भीलों को कृषि कार्य में परिश्रम करने के अतिरिक्त कुंए खोदने व खेतों में मेड़ बनाने की सलाह दी। परिणामस्वरूप कुओं की संख्या में वृध्दि हुई व भील परिवारों का भी सीमित कृषि के कारण अपराधी जीवन व्यतीत करने लगे।
गोविन्द गिरी ने भीलों में चेतना लाने का श्रीगणेश किया। उन्होंने देखा कि डूंगरपुर में एक सुसंगठित भील संगठन होना इस ध्येय को सिद्ध करने के लिए एक सम्प 'सभा' की स्थापना की। उन्होंने 1881 में ईडर राज्य के भील बाहुल्य अंचलों में 'भगत' आन्दोलन प्रारंभ किया। इस आन्दोलन का मुख्य केन्द्र गोविन्द गिरी का 'धुणी' था। गोविन्द गिरी ने भीलों को धार्मिक व सामाजिक बुराइयों से दूर रहने व एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए गोविन्द गिरी ने वागड़ की भील जनता में 'सम्प सभा' के माध्यम से राजनीतिक चेतना जागृत की। गोविन्द गिरी ने भीलों को अंग्रेजों व रियासतों के शोषण के विरूद्ध एकजुट किया।
धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन के माध्यम से भीलों को संगठित करने के बाद गोविन्द गिरी ने भीलों की विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु प्रयास किया। उन्होंने भीलों को अपने हितों की रक्षार्थ सामन्तों व रियासती अधिकारियों के अत्याचारों के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। गोविन्द गिरी ने भीलों को धार्मिक व सामाजिक उपदेश दिये। उन्होंने भीलों को अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने, साफ-सुथरे रहने व अपने घरों में शराब नहीं बनाने का आदेश दिया। गोविन्द गिरी के इन उपदेशों का भीलों पर गहरा प्रभाव पड़ा। भीलों ने धीरे-धीरे अपनी बुराइयों को त्यागना प्रारंभ किया। गोविन्द गिरी के इन कार्यों से सामन्त व रियासती अधिकारी घबरा गए। उन्होंने गोविन्द गिरी पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गोविन्द गिरी को 10 वर्ष की सजा सुनाई गई। सजा पूरी करने के बाद गोविन्द गिरी ने पुनः भीलों को संगठित करने का प्रयास किया।
गोविन्द गिरी के धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य भीलों में चेतना जागृत कर उन्हें संगठित करना था। उन्होंने भीलों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। गोविन्द गिरी के इन प्रयासों से भीलों में राजनीतिक चेतना जागृत हुई। भीलों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना प्रारंभ किया।
गोविन्द गिरी के आन्दोलन के बाद भीलों में शिक्षा का प्रसार हुआ। भीलों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना प्रारंभ किया। भीलों ने धीरे-धीरे अपनी बुराइयों को त्यागना प्रारंभ किया। भीलों में साफ-सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ी। भीलों ने अपने घरों में शराब बनाना बंद कर दिया।
इस प्रकार गोविन्द गिरी के धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन ने भीलों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उन्होंने भीलों को एक नई दिशा दी। गोविन्द गिरी के इन कार्यों से भीलों में राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई। भीलों ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गोविन्द गिरी के विचारों का भील जनजाति पर गहरा प्रभाव पड़ा। भीलों ने उनके विचारों को आत्मसात किया। गोविन्द गिरी के विचारों ने भीलों को एक नई पहचान दी।
गोविन्द गिरी के विचारों का वागड़ क्षेत्र पर प्रभाव
गोविन्द गिरी के विचारों का भील जनजाति पर गहरा प्रभाव पड़ा। भीलों ने उनके विचारों को आत्मसात किया। गोविन्द गिरी के विचारों ने भीलों को एक नई पहचान दी।
गोविन्द गिरी ने भीलों में शिक्षा के प्रसार पर बल दिया। उन्होंने भीलों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया। गोविन्द गिरी के इन प्रयासों से भीलों में शिक्षा का प्रसार हुआ।
गोविन्द गिरी ने भीलों में साफ-सफाई के प्रति जागरूकता पैदा की। उन्होंने भीलों को अपने घरों को साफ-सुथरा रखने के लिए प्रेरित किया। गोविन्द गिरी के इन प्रयासों से भीलों में साफ-सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ी।
गोविन्द गिरी ने भीलों में शराबबंदी पर बल दिया। उन्होंने भीलों को अपने घरों में शराब नहीं बनाने के लिए प्रेरित किया। गोविन्द गिरी के इन प्रयासों से भीलों ने शराब बनाना बंद कर दिया।
इस प्रकार गोविन्द गिरी के विचारों ने भीलों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उन्होंने भीलों को एक नई दिशा दी। गोविन्द गिरी के इन कार्यों से भीलों में राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई। भीलों ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सेवा संघ डूंगरपुर-
भोगीलाल पण्ड्या ने माणिक्यलाल वर्मा द्वारा दिये गये सुझावों का पालन करते हुए 15 मार्च, 1938 को सेवा संघ डूंगरपुर की स्थापना की। सेवा संघ डूंगरपुर के भी वही उद्देश्य थे जो वागड़ सेवा मंदिर के थे।
सेवा संघ डूंगरपुर के प्रारंभिक रचनात्मक कार्य निम्न प्रकार थे:
शिक्षा - सेवा संघ डूंगरपुर की प्रमुख गतिविधियों में प्रारंभिक कक्षाओं में बालकों को व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा, प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का कार्य प्रारंभ किया। इसका परिणाम यह निकला कि आदिवासियों में सामाजिक जन चेतना जागृत होने लगी।
आर्थिक उन्नति - आदिवासियों की आर्थिक उन्नति के लिए सेवा संघ डूंगरपुर ने निम्न गतिविधियों को प्रारंभ किया-
कृषि औजारों को उपलब्ध कराना -सिंचाई के साधनों के विकास के लिये सहायता देकर नये कुंए खुदवाना तथा पुराने कुंए गहरे करवाना, कार्यों को प्राथमिकता दी।
अच्छी किस्म का खाद, बीज का उपयोग करने तथा वैज्ञानिक तरीके से कृषि करने के बारे में आदिवासियों को जानकारी देना।
बैठ-बेगार तथा लाग-बाग में कमी करने के लिए रियासत पर दबाव बढ़ाना।
आदिवासियों को स्वावलम्बी बनाने के लिए विभिन्न कुटीर उद्योगों के लिए प्रशिक्षण देना आदि कार्यों को प्रोत्साहन दिया।
सामाजिक बुराईयों का निराकरण - सेवा संघ डूंगरपुर ने आदिवासी समाज में व्याप्त विभिन्न बुराईयों के निराकरण में निम्नांकित बिन्दुओं पर जोर दिया-
दापा तथा पड़ला प्रथा का विरोध करना।
पराई स्त्री (विवाहिता) के अपहरण को बन्द करना।
किसी मेले-उत्सवों में कुंवारी कन्याओं को भगा लेने की प्रथा को अमान्य करना।
सामाजिक कार्यों, मृत्युभोज के अवसर पर होने वाला फिजूल खर्च बन्द करवाने पर जोर देना।
पारम्परिक तथा सामाजिक अवसरों पर मद्यपान को निषेध करवाना।
सेवा संघ से पूर्व इस क्षेत्र में गोविन्द गिरी ने अपने आन्दोलन के तहत इन्हीं मुद्दों पर आवाज उठाई थी। परन्तु सेवा संघ ने अपने कार्यक्रमों में दो बिन्दुओं को और जोड़ दिया:
स्त्रियों द्वारा घुटनों तक पीतल की पिजणियां पहनना बन्द करवाना।
विधवा विवाह के अन्तर्गत बड़े भाई की मृत्यु के बाद छोटे भाई पर पछेड़ी डालने की प्रथा को बन्द करना।
सेवा संघ के कार्यक्रमों को व्यवस्थित चलाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं को प्रभावित कर नियुक्त किया जिनमें भोगी लाल पण्ड्या सेवा संघ के अध्यक्ष, बालवन्त सिंह मेहता, गौरीशंकर उपाध्याय को मंत्री, देवेन्द्रकर पण्ड्या को संगठन मंत्री, पूरणलाल को कोषाध्यक्ष तथा कन्हैयालाल शाह, बहादुर लाल माथुर, गौरीशंकर त्रिवेदी को शैक्षिक निरीक्षक तथा श्री भोगीलाल पण्ड्या को मंत्री बनाया गया। इन कार्यकर्ताओं का कार्य विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासियों से संपर्क रखते हुए, जिसमें मुख्य गोपाल लाल, कुबेर लाल गौड़, मुखिया भगत, दीनबन्धु परमार, हिरालाल आहार, लक्ष्मण सैय्यार, लाल लाल सैय्यार, नन्द परमार, भिकालाल कोटेडिया आदि आते थे।
डूंगरपुर में राम नारायण चौधरी, माणिक्यलाल वर्मा तथा भोगीलाल पण्ड्या ने गांधी विचार धारा के माध्यम से आदिवासियों में जन जागृति का कार्य शुरू किया।
वागड़ सेवा मंदिर- 1932 ई. में रामनारायण चौधरी द्वारा स्थापित राजस्थान सेवक मण्डल की एक शाखा डूंगरपुर रियासत में खोली गई तथा इसका नाम "वागड़ सेवा मंदिर" आश्रम रखा गया। वागड़ सेवा मंदिर सेवा आश्रम के माध्यम से डूंगरपुर के आदिवासियों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार, खादी का प्रचार-प्रसार, नशा विरोध, अस्पृश्यता निवारण आदि रचनात्मक कार्य प्रारंभ किये। वागड़ सेवा मंदिर में राजस्थान सेवा संघ के पुराने कार्यकर्ताओं को भी सम्मिलित किया। इसके तत्वावधान में 1934 ई. में माणिक्यलाल वर्मा तथा दुर्गाप्रसाद भील ने डूंगरपुर नगर से 48 किमी दूर खड़लाई पाल में एक पाठशाला खोली। इसके बाद डूंगरपुर से 15 किमी दूर पातली में एक पाठशाला तथा बुनाई का प्रशिक्षण केन्द्र खोला। इसके अतिरिक्त वागड़ सेवा मंदिर के कार्यकर्ताओं ने औषधि वितरण का कार्य भी प्रारंभ किया।
सामाजिक सुधार में आदिवासी जातियों की आदतों, रूढ़ियों, परम्पराओं तथा मान्यताओं के प्रति विरोध की भावना पैदा करना, कृषि की दशा में उन्नति, सूदखोरी तथा बेगारी के विरूद्ध आवाज उठाना जैसे अनेकानेक परिवर्तनकारी कदम वागड़ सेवा मंदिर के निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने उठाने शुरू किए। तत्कालीन परिस्थिति के मध्य नजर रखते हुए माणिक्यलाल वर्मा ने इस क्षेत्र के साहुकारों, सामन्तों तथा जागीरदारों के विरूद्ध भील कृषकों तथा श्रमिकों को इस संस्था में प्रशिक्षण दिया।
वागड़ सेवा मंदिर ने आर्थिक उत्पादन के लिए निम्नलिखित कार्यों को आरंभ किया:
1.कुंए गहरे करवाना।
2.दो फसली पैदावार लेने हेतु कृषकों को प्रोत्साहित करना।
3.मवेशियों तथा मनुष्यों के लिए अलग-अलग आवास बनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
4.अच्छी किस्म के दुधारू पशु रखने का सुझाव देना।
5.भील कृषकों को नशा मुक्ति के लिए प्रेरित करना।
6.अछूतोद्धार कार्यों के लिए सहभागिता से कार्य करने के लिए कृषकों को प्रेरित करना।
7.नशा विरोध का कार्य भील कृषकों के लिए प्रेरणा का कारण बना।
8.सादा जीवन के लिए भीलों को खादी एवं बुनाई का प्रशिक्षण देना।
9.खादी के लिए चरखा वितरण तथा प्रचार करना।
इस प्रकार मोतीलाल तेजावत द्वारा किये गये आन्दोलन में साथ दिया, वरन उन्होंने स्वाधीनता की लड़ाई में भी सहयोग दिया। मेवाड़ में बलवन्त सिंह मेहता ने आदिवासियों में प्रजामण्डल के तहत कार्य किया। डूंगरपुर में राम नारायण चौधरी, माणिक्यलाल वर्मा तथा भोगीलाल पण्ड्या ने गांधी विचार धारा के माध्यम से आदिवासियों में जन जागृति का कार्य शुरू किया।
डूंगरपुर रियासत के विभिन्न क्षेत्रों में भीलों की "पालों" में प्राथमिक विद्यालय खोले गये। कृष्ण गोपाल भील ने गांधी आश्रम डूंगरपुर के मंत्री को पत्र लिखा कि 1940 ई. से उसके पिता कांकरवा क्षेत्र में सेवा संघ का स्कूल चला रहे थे। नाना भाई भील के पुत्र सेगा भाई के प्रार्थना पत्र में उल्लेख है कि उसने सेवा संघ की एक पाठशाला में अध्ययन किया था, तथा 1942 ई. में उसे सेवा संघ का कार्यकर्ता होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। 1941 ई. में सेवा संघ डूंगरपुर के तत्वावधान में नौ दिवसीय पाठशालाएं और बारह रात्रि पाठशालायें आदिवासी क्षेत्रों में चल रही थी। इनमें हरिजनों के लिए दो पाठशालायें थी। आदिवासी छात्रों के लिए एक छात्रावास था जिसमें चौदह भील छात्र रहते थे। इसके अतिरिक्त एक सार्वजनिक छात्रावास भी डूंगरपुर में चलाया जा रहा था, जिसमें 53 छात्र रहते थे
व्यावहारिक शिक्षा के साथ-साथ समाज सेवा ओर जन जागरण के लिए सेवा संघ ने भीलों में व्याप्त सामाजिक बुराईयों को दूर करने का कार्य भी बड़े उत्साहपूर्वक किया। उपाध्याय ने इस संबंध में वागड़ी बोली में अनेक गीतों की रचना की। इन गीतों में बाल विवाह, अनमेल विवाह, दापा प्रथा, मृत्युभोज आदि विषयों पर रचित गीत उल्लेखनीय हैं। मद्यपान के विरूद्ध भी गीतों व अन्य तरीकों से प्रचारं किया गया। आदिवासियों में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों के माध्यम से भीलों में व्याप्त बुराईयों को दूर करने का कार्य किया जाने लगा।
राजनैतिक जागृति -इसी दौरान सारे देश में महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ों आन्दोलन प्रारंभ हुआ। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर सेवा संघ द्वारा " भारत छोड़ों आन्दोलन" को डूंगरपुर राज्य में भी प्रारंभ किया गया। रियासत के कर्णधारों ने इस आन्दोलन को पनपने के पहले ही कुचल देने का निश्चय किया। 17 अगस्त 1942 ई. को सेवा संघ ने डूंगरपुर के रचनात्मक कार्यों को राजनीतिक दृष्टि से देखे जाने का प्रस्ताव पारित किया।"
सेवा संघ के सभी कार्यकर्ता इस आन्दोलन में भाग लेने को उत्सुक थे। अतएव 27 अगस्त, 1942 को संघ ने एक प्रस्ताव पारित किया। इसमें संघ ने भारत सरकार द्वारा महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं को बन्दी बनाने की कार्यवाही की निंदा की तथा कांग्रेस द्वारा चलाये गये संघर्ष की सारी जिम्मेदारी उठाने पर बल दिया। डूंगरपुर के प्रान्त शिक्षाधिकारी ने 5 सितम्बर 1942 ई. को संघ ने कांग्रेस के शैक्षिक आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने का निश्चय किया। उसने सरकार को तैयार कर संघ के से त्याग पत्र दे दिया। इस तरह सेवा संघ के अध्यक्ष कार्यकर्ताओं देश को स्वाधीन कराने के कांग्रेस की नीति को अपने कार्यों को कार्यान्वित करने के लिए अपनाये गये।एक सार्वजनिक आन्दोलन को कुचलने का आदेश देने का सेवा संघ के राजनीतिक स्वरूप पूर्ण रूप से निश्चित हो जाने के उपरान्त आन्दोलन को सेवा संघ के कार्यकर्ताओं की दूसरी ओर राज्य सरकार इस आन्दोलन को कुचलने में जुट गई। राज्य के अधिकारियों ने सेवा संघ को नहीं तोड़ने का प्रयत्न भी किया। रियासत के प्रधानमंत्री ने स्वयं सेवा संघ के कुछ कार्यकर्ताओं को अपने कार्यालय में बुलाया और राजनीतिक कार्यों को छोड़कर रचनात्मक कार्यों को करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन लोक सेवा के कार्य में जुट रहे।"
भीलों को डराने व धमकाने का कार्य रियासत के अधिकारियों ने रचनात्मक कार्यों को राजनीतिक रंग देने का प्रयत्न भी किया। भीलों व स्थान की सेवा को जनता के साथ के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न आदिवासी गांवों में जाकर अनौपचारिक सभाएं करनी शुरू की। भीलों को डराने तथा धमकाने का कार्य किया जाने लगा। स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को राज्य सरकार ने यह चेतावनी भी जारी करनी तथा उसमें पढ़ने को मना किया। लोगों को डराने के लिए जागीरदारों व राज्य के अधिकारियों ने भीलों को हर तरह से परेशान किया। उन्होंने खेल व पाठशालाओं को भीलों को डराने के लिए जागीरदारों व राज्य के अधिकारियों ने भीलों को हर तरह से परेशान किया। उन्होंने खेल व पाठशालाओं पर कब्जा लगा लिया तथा उन्हें बंद करने की कोशिश की गई। भीलों में शिक्षा के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा का प्रश्न भी किया।
सेवा संघ तथा डूंगरपुर राज्य में संघर्ष की शुरुआत-
इसी प्रकार सेवा संघ तथा डूंगरपुर राज्य में संघर्ष की शुरुआत जन जागरण का जन्म 17 अगस्त, 1942 ई. 4.30 बजे को उस दिन हुआ, जिस रोज रियासत की पुलिस आदिवासियों की एक पाठशाला में घुसकर उन्हें वहां से निकाल दिया। भीलों में रियासत द्वारा प्रचलित किए गए सभी दमनकारी कार्यकलाप द्वारा प्रकाशित संख्या 270 दिनांक 22.09.43 ई. के द्वारा प्रादेशिक सरकार को प्रस्तुत किए गए।संचालन नियम और कवायद छात्रावास 1943 ई. का कड़ा विरोध किया गया था। प्रजामण्डल की स्थापना के साथ-साथ सेवा संघ की प्रवृत्तियां भी चलती रही।"
सेवा संघ के केन्द्रों में कार्य करने वाले भीलों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती गई। उनमें शासकीय, सामन्ती और सरकारी अधिकारियों के उत्पीड़न के विरूद्ध रोष बढ़ता गया। अपनी सफलता से उत्साहित होकर सेवा संघ ने अपनी प्रवृत्तियों और गतिविधियों का विस्तार बांसवाड़ा राज्य में भी प्रारंभ किया। सेवा संघ के कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं की सेवाओं के कारण डूंगरपुर क्षेत्र की जनता में (विशेषकर आदिवासियों) में उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। इससे रियासत की सरकार चिन्तित हो उठी। वह सेवा संघ के कार्यों को राज्य के लिये खतरनाक मानने लगी। राज्य के कर्णधारों को यह आशंका थी कि भीलों व अन्य पिछड़े वर्गों में जागृति होने से एक गंभीर परिस्थिति पैदा हो जायेगी।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-
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6.द्विवेदी, डॉ. दिनेश" डूंगरपुर रियासत में स्वाधीनता आन्दोलन एवं संवैधानिक विकास" 1900-1947, अप्रकाशित, पृ.सं. 93-95
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