संदेश

आस्था एवं विश्वास का प्रमुख केंद्र वागड़ का त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर

       दक्षिणी राजस्थान का वागड़ क्षेत्र अपनी लोक संस्कृति और आध्यात्मिकता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां पर लोक आस्था और धार्मिक दृष्टि से अनेक मंदिर और उपासना केंद्र है जिसमें विश्व प्रसिद्ध है मां त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर जो बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 15कि.मि.दूर स्थिति तलवाड़ा के पास उमराई गांव की पहाड़ियों में स्थित मां त्रिपुरा सुंदरी माता का एक प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर है।        राजस्थान के दक्षिणी अंचल में स्थित वागड़ क्षेत्र अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की भूमि आदिकाल से देवी उपासना की भूमि रही है। वागड़ की धरती पर कई देवी-देवताओं के तीर्थस्थल विद्यमान हैं, जिनमें सबसे प्रमुख और पूजनीय स्थान है - त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर , जो बांसवाड़ा जिले में स्थित है। यह मंदिर न केवल वागड़ की आस्था का केंद्र है, बल्कि राजस्थान की शक्ति उपासना परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है।   परिचय-  त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर बांसवाड़ा जिले के तलवाड़ा कस्बे के पास स्थित है। यह मंदिर वागड़ क्षेत्र के स...

जनजातीय जीवन शैली और परंपराओं पर आधुनिकता का प्रभाव

   जनजातीय समाज भारतीय आदिम संस्कृति का प्रतिनिधि रहा है और आज भी भारतीय संस्कृति को संजोए हुए है। आज आदिवासी समाज जंगल और वनों पर ही आधारित न होकर धीरे शिक्षा, कृषि अर्थव्यवस्था की और अग्रसर हो रहा है।  आधुनिक समाजों की तुलना में जनजातीय समाज की सभ्यता और संस्कृति को विकास-क्रम में बहुत पिछड़ा हुआ एवं श्रम-विभाजन की दृष्टि से सरल श्रम-विभाजन से प्रभावित समाज माना गया है। विश्व के लगभग सभी समाजों में इस प्रकार के जनजातीय समुदाय न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान हैं जिनको विविध सामान्य विशेषताओं के आधार पर नगरीय, औद्योगिक कृत या अन्य ग्रामीण समुदायों से अलग करके रखा गया है। सामान्यतः जनजातीय समुदाय जंगलों, पहाड़ों एवं सुदूर वनों में रहने वाले ऐसे मानव समुदाय हैं जिनका औद्योगिक और नगरी समुदायों से बहुत कम सम्पर्क रहा है तथा अपनी पृथकता के कारण विशेष सभ्यता और सामाजिक व्यवस्था से अधिक पहचाने गए हैं। परन्तु वर्तमान में जनजाति समाज पर आधुनिकता का प्रभाव पड़ा है जिसके कारण जनजातीय संस्कृति संक्रमित हो रही है। प्रस्तावना - भारत एक बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी देश है। यहाँ की स...

वागड़ की भील जनजाति-इतिहास के परिप्रेक्ष्य में

     भील जनजाति दक्षिणी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र की प्रमुख जनजाति है। वागड़ क्षेत्र में  मीणा, गरासिया और डामोर जनजातियाँ  भी निवास करती है। भील बहुसंख्यक बांसवाड़ा - डूंगरपुर जिले जनजाति उपयोजना क्षेत्र (Tribal Sub-Plan) घोषित है। लगभग 80 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23°.1 से 24°.1 उत्तरी अक्षांस एवं 73°.1 से 74°.1 पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर, पूर्व में मध्यप्रदेश तथा दक्षिण पश्चिम में गुजरात राज्य की सीमाएं लगी हुई है। इसका क्षेत्रफल करीब 4000 वर्ग  है।         इस प्रदेश का वागड़ नाम करीब एक सहस्त्राब्दी से प्रचलित पाया जाता है। पुराने शिलालेखों, ताम्रपत्रों, जीवन चरित्रों तथा अन्य प्रशस्तियों आदि में इसका उल्लेख प्राप्य है। संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं के विद्वानों ने इसे वागट, वग्गड़ वैयागड़ एवं वागवर आदि शब्दों से सम्बोधित किया है। प्राचीन वागड़ क्षेत्र में वर्तमान डूंगरपुर और बांसवाड़ा के राज्यों तथा मेवाड़ राज्य का कुछ दक्षिणी भाग अर्थात् छप्पन नामक प्रदेश का समावेश होता...

वागड़ के जनजातीय समाज में स्वास्थ्य स्थिति एवं रोग उपचार पद्धतियां

     राजस्थान के दक्षिणी छोर में गुजरात और मध्यप्रदेश की सरहदों व लोक संस्कृति से प्रभावित आदिवासी संस्कृति को समेटे हुये वाग्वर अंचल नैसर्गिक सौन्दर्य से लकदल यह अरावली की छितराई रमणीय उपत्यकाओं से घिरा हुआ है। यह क्षेत्र आध्यात्मिक चिंतन, सिद्ध-संतों, भक्त कवियों, आदिम संस्कृति के साथ ही अपने पुरातत्व, शिल्प, स्थापत्य व समृद्ध इतिहास के लिए प्रदेश भर में ख्यातनाम रहा है।       दक्षिणी  राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले सम्मिलित है। दोनों ही जिले जनजाति उप-योजना (Tribal Sub-Plan) अनुसूचित क्षेत्र घोषित है। आदिवासी जनजातियों की लगभग 80 प्रतिशत आबादी वाला वागड़ का विशाल क्षेत्र 23° - 1 से 24° - 1 उत्तरी  अक्षांस एवं 73°-1 से 74°-24 पूर्वी देशान्तरों के मध्य स्थित है। इसके उत्तर में उदयपुर पूर्व में मध्य प्रदेश तथा दक्षिण-पश्चिम में गुजरात राज्य की सीमाएं लगी हुई है। इसका क्षेत्रफल करीब 4000 वर्गमील है। स्वास्थ्य स्थिति-    स्वतंत्रता प्राप्ति से ही देश के ग्रामीण, शहरी व आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य की समुचित सुव...

थारू जनजाति समाज में शिक्षा, जागरूकता एवं विकास

     समाज और शिक्षा का एक दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध है। एक की प्रगति पर दूसरे की प्रगति निर्भर है, एक की अवनति दूसरे के नाश का कारण भी बन जाती है।      भारत एक बहुरंगी और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ विभिन्न जनजातियाँ अपने विशिष्ट जीवन मूल्यों, परंपराओं और संस्कृतियों के साथ निवास करती हैं। इन्हीं जनजातियों में से एक है थारू जनजाति, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र तथा नेपाल की सीमाओं के आसपास पाई जाती है। थारू समाज की पहचान उनके पारंपरिक जीवन, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोककला और प्रकृति-आधारित जीवनशैली से होती है। किंतु आधुनिक युग में जब शिक्षा और ज्ञान को विकास की कुंजी माना जा रहा है, तब थारू जनजाति में शिक्षा एवं साक्षरता की स्थिति एक गंभीर विचार का विषय बन गई है। परिचय- थारू जनजाति उत्तर भारत की प्रमुख जनजातियों में से एक है। इनकी बसावट मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती, महाराजगंज और पीलीभीत जिलों में है। थारू समुदाय के लोग मूलतः कृषक हैं और इनका जीवन जंगलों, नदियों और खेतों से गहराई से जुड़ा हुआ है। थारू ल...

वनाधिकार अधिनियम 2006-परंपरागत से कानूनी अधिकार तक

     वन आदिवासियों की धरोहर एवं शरण स्थली रहे है। वनों से ही उनकी संस्कृति की सुरक्षा और गरिमा प्रदान होती रही हैं। वन और आदिवासी एक -दूसरे के पूरक है।वस्तुतः वन जनजातियों के पोषक रहे है। जिनसे उन्हें विभिन्न प्रत्यक्ष लाभ जैसे ईधन, मवेशियों के लिए चारा मकान निर्माण के लिए लकड़ी खाद, फल-फूल, सब्जियां खाने योग्य कन्दमूल, चिभिन्न प्रकार की लकड़ियां, जडी-बूटिया अनेक वाणिज्य उपयोगी लघु वन उत्पादित वस्तुएं आदि प्राप्त हुए है। अप्रत्यक्ष लाभ-स्वच्छ और शीतल वायु, पक्षियों का कलरव, संतुलित तापमान समय पर वर्षा, हरियाली, खुशबू आंधी और तूफान से रोक तथा बाढ़ आदि से बचाव भी होता रहा है।       वनों के संरक्षण से ही जनजातियों के परम्परागत विश्वास ,प्रथाएं ,रिवाज, लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाए, लोकमान्यताएं उनकी बोली तथा उनके जादू-टोने आदि की बाहरी दुनिया के हस्तक्षेप से रक्षा होती रही है। अतः वनों से न सिर्फ उन्हें मातृत्व तुल्य लाभ प्रदान हुआ है बल्कि उन्हें आश्रय, भोजन, रोजगार तथा सुदृढ संस्कृति भी प्रदान होती रही है। परंतु ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं भारतीय वन नीति के अतिरिक्त ...

आदिवासियों की प्राकृतिक- धरोहर साझा वन प्रबंधन

     जनजातीय समुदाय आज भी देश की मुख्य धारा से पृथक है। यह समुदाय सर्वाधिक उपेक्षित और राजनीतिक दृष्टि से भी सबसे कम शक्तिशाली है। देश के विभिन्न भागों में ऐस समुदाय अपने देश की प्रमुख भाषा, धर्म, संस्कृति और शक्ति संरचना से अलग-थलग देखे जा सकते हैं। इन समुदायों के साथ रंग, जाति, धर्म, कानून एवं पूर्वाग्रहों के आधार पर सामाजिक जीवन में भी भेद किया जा सकता है।       अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी परिवर्तन के बावजूद विश्व के दूर-दराज क्षेत्रों में लगभग 50 करोड़ आदिवासी हैं जिनके पास अमूल्य पारिस्थितिकी वन की सम्पदा सुरक्षित हैं। इन आदिवासियों और वनों के बीच एक अटूट रिश्ता है अर्थात् आदिवासियों के लिए वन उनके जीवन का आधार है। इन आदिवासियों के पास उपलब्ध पर्यावरणीय जानकारी एवं बुद्धिमता से प्रकृति और मनुष्य के बीच उचित सम्बन्धों को समझने में भी सहायता मिल सकती है ।लेकिन दुर्भाग्य यह है कि प्रौद्योगिकी विकास, पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति की आंधी में आदिम और मूल संस्कृतियाँ, भाषाएँ, रीति रिवाज और जीवन शैली उखड़कर नष्ट हो रही है जिसके कारण समृद्ध पर्यावरणीय...