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शूद्र नहीं सुसंस्कृत हैं वनवासी

भारत अपनी जिन विलक्षणताओं के कारण संसार के सबसे अद्भुत देश के रूप में जाना जाता है उसमें सर्वाधिक विशेष है यहां की भगवत्ता के शिखर में समृद्ध हुई बहुआयामी संस्कृति, संस्कृति शब्द का अर्थ अंग्रेजी कल्चर से कहीं अधिक विस्तृत है। कल्चर शब्द का प्रयोग अधिकांशतः जीवन के कुछ ही पक्ष जो सभ्यता के पहलुओं को दर्शाते है। जैसे-नृत्यगीत, भाषा ,ललित कलाओं आदि पर सिमट जाते है। प्राचीन भारत में संस्कृत शब्द का व्यवहार सुधरी हुई अर्थात् परिस्कृत जीवन पद्धति के लिए किया जाता था। संस्कृति से तात्पर्य संस्कारों से उत्तरोतर जीवन में विकास होने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया से है। संस्कृति का परिष्कार या शुद्धि के अर्थ में प्रयोग वैदिककाल से ही होता आया है। याश्क ने शब्द की शुद्ध निष्पति के प्रसंग में सम्पूर्ण सम्पूर्वक क्र धातु का प्रयोग किया है_ "पदेभ्यः पदेन्रातरधान धारण संस्कार शाकटायनः" परिष्करण  के अर्थ में  पाणिनि का सुत्र "संस्कृत भक्षा: प्रसिद्ध ही है। परिष्कार की यह प्रक्रिया मानव जीवन में संस्कार का रूप लेकर प्रयुक्त हुई। शूद्र से तात्पर्य है -       मनु ने कहा "जन्मना जायते शु...

आदिवासी विकास:चिंतन और सरोकार

  हमारा देश विशाल गांव का पूंज है | भारत एक ग्रामीण एवं  कृषि प्रधान देश है जिसकी लगभग 80% जनता आज भी गावों में निवास करती है|गांवऔर गांववासियों की इतनी बड़ी संख्या के विकास बिना हमारे विकास के दावे निश्चित रूप से खोखले ही रहेंगे | अर्थात यदि देश का संतुलित विकास  करना है तो प्रभावी ग्रामीण एवं आदिवासी विकास हमारी अहम,ओर आधारभूत आवश्यकता है     भारत गावों का देश है | इसकी आत्मा गावों में वास करती है | भारत विविधताओं का देश है जहां अनेक जातियों,भाषाएं, संस्कृतियां ओर परंपराएं सह_अस्तित्व में है | इन्हीं में एक महत्वपूर्ण समुदाय_ आदिवासी या जनजातीय समुदाय  है जो प्राचीनकाल से प्रकृति के साथ सहजीवन में रहते आए है | जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान,जीवनशैली,परंपराएं,ओर स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां है लेकिन आजादी के बाद हुए विकास की दौड़ में पीछे रह गए, उपेक्षित रह गए ओर वे विकास की मुख्य धारा से कोसों दूर रह गए| इसी संदर्भ में आदिवासी विकास: चिंतन ओर सरोकार एक समकालीन और विकसित भारत के संदर्भ में आवश्यक विषय बन जाता है|   आदिवासी विकास से तात...